साफ्टवेयर कंपनी यालामनचिली ने संवारी जिले की बिरसा तहसील की दस शालाओं की तस्वीर

साफ्टवेयर कंपनी यालामनचिली ने संवारी जिले की बिरसा तहसील की दस शालाओं की तस्वीर।

साफ्टवेयर कंपनी यालामनचिली ने संवारी जिले की बिरसा तहसील की दस शालाओं की तस्वीर।

बालाघाट (टोपराम पटले) - हमारे देश में ऐसे कई समाजसेवी हुए हैं जिन्होंने अलग अलग क्षेत्रों में सेवा करते हुए लोगों जे जीवन स्तर, रहन-सहन और आर्थिक रूप से आमूल चूल परिवर्तन ला दिया है । ऐसे ही एक समाजसेवी हैं  रामकृष्ण यालामंचिली जिन्होंने ब जिले के आदिवासी बाहुल्य बिरसा जनपद के आठ स्कूलों की दशा और दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है । इस परिवर्तन से छात्र-छात्राएं भी बहुत खुश हैं ।

साफ्टवेयर कंपनी के मालिक रामकृष्ण यालामंचिली ने बालाघाट जिले के कान्हा नेशनल पार्क से लगे आदिवासी बाहुल्य ग्रामों की 08 शालाओं की तस्वीर ही बदल दी है। इन शालाओं में यालामंचिली कंपनी की मदद से एलईडी टीव्ही की स्क्रीन पर बच्चों को पढ़ाया जाता है। यालामंचिली कंपनी की ओर से इन शालाओं को कुल मिलाकर 50 लाख रुपये से अधिक की मदद की गई है। 

चेन्नई की साफ्वेयर कंपनी यालामंचिली के मालिक रामकृष्ण यालामंचिली वर्ष 2017 में कान्हा नेशनल पार्क के भ्रमण पर आये थे तो उनके मन में जिज्ञासा हुई कि नेशनल पार्क से लगे ग्रामों के स्कूलों में बच्चों को कैसे पढ़ाया जाता है, यह देखा जाये। यह देखने के लिए वे शासकीय प्राथमिक शाला गुदमा पहुंचे और वहां के बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में चर्चा की। बच्चों से चर्चा के दौरान उन्हें पता चला कि यहां पर बच्चों को केवल पुस्तकों के माध्यम से पढ़ाई कराई जाती है। इस पर उन्हें आश्चर्य हुआ और इसके बाद उन्होंने शाला के शिक्षक नरेंद्र ब्रम्हनोटे से चर्चा कर कहा कि वे कान्हा नेशनल पार्क से लगे ग्रामों की शालाओं में शिक्षा के लिए आधारभूत सुविधायें उपलब्ध कराना चाहते है। जिससे बच्चे नवीनतम तकनीक के माध्यम से पढ़ाई कर सकेगें और शाला में बुनियादी आवश्यकता की सभी चीजें उपलब्ध हो जायेंगी।  शिक्षक ब्रम्हनोटे ने अपने क्षेत्र के बीआरसी हेमंत राणा से यह बात बताई तो वे भी कंपनी की मदद करने के प्रस्ताव से खुश हो गये।

साफ्टवेयर कंपनी यालामनचिली ने संवारी जिले की बिरसा तहसील की दस शालाओं की तस्वीर।

रामकृष्ण यालामंचिली मदद का आश्वासन देकर चले गये, लेकिन उन्होंने अपनी कंपनी में कक्षा पहली से लेकर कक्षा 08 तक की सभी पाठ्यसामग्री को कम्प्यूटर में अपलोड कर एक साफ्टवेयर बना दिया है। इस साफ्टवेयर के माध्यम से बड़ी एलईडी टीव्ही स्क्रीन पर शिक्षक बच्चों को बड़ी आसानी से पढ़ा सकते है। यालामंचिली कंपनी की ओर से मदद के लिए शासकीय प्राथमिक शाला गुदमा, लगमा, भीमा, डोंडियाटोला, सहेगांव, सारसडोल, पांड्याटोला एवं माध्यमिक शाला सारसडोल का चयन किया गया और कंपनी के इंजीनियर ने आकर इन शालाओं में एक नालेज टर्मिनल स्थापित कर दिया है। नॉलेज टर्मिनल को इस तरह बनाया गया है जिसमें कक्षा 1 से लेकर 8 तक की समस्त पुस्तकों को हिन्दी माध्यम में सॉफ्ट कापी में इंस्टाल किया गया है । जिससे शिक्षक आसानी से उसे टी वी में दिखा कर अध्यापन कार्य करा सकते है। साथ ही इस नॉलेज टर्मिनल में शैक्षिक विडियों को भी इंस्टाल किया गया जिससे शिक्षक मनोरंजन के साथ बच्चों को पढ़ा सके । इस नॉलेज टर्मिनल में पेन ड्राइव लगाने की सुविधा भी प्रदान की गई है। जिससे अन्य जगहों से प्राप्त शैक्षिक वीडियों को दिखा कर बच्चों के ज्ञान को बढ़ाया जा सके । इस टर्मिनल में 24 घंटे बिजली देने वाली बैटरी एवं इनवर्टर, 42 इंच की एलईडी टीव्ही एवं इसी टीव्ही को शिक्षक के पढ़ाने के लिए तैयार किये गये डायस से जोड़ा गया है। शिक्षक अपने डायस पर लगी बटनों के माध्यम से टीव्ही को संचालित कर सकता है। 

यालामंचिली कंपनी की ओर से चयनित शालाओं में 2 लाख रुपये की लागत से बालक एवं बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय एवं हाथ धोने के लिए बेसिन लगावाया गया है। शाला में लगे हेंडपंप में सबमर्सिबल पंप लगाकर शौचालय में एवं बच्चों के पीने के लिए साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। शाला के बच्चों के लिए उनकी उंचाई के अनुसार डेस्क उपलब्ध कराई गई है। शाला के सभी क्लासरूम में एक-एक घड़ी लगवाई गई है। कंपनी की ओर से इन शालाओं में ग्रामीण क्षेत्र में विद्युत की समस्या को देखते हुए 24 बोल्ट की बैटरी एवं साथ में इंवर्टर भी प्रदान किया गया है। ताकि जब भी शाला में विद्युत ना रहे तो इस बैटरी के उपयोग से बच्चों को नालेज टर्मिनल एवं टी वी के माध्यम से शैक्षणिक कार्य कराया जा सके ।

जिन-जिन शालाओं को यालामंचिली द्वारा सामग्री प्रदान की गई है उन विद्यालयों का स्वरूप आज अपने आप बदल गया । जिन विद्यालयों को इस कंपनी ने सामग्री दी है वो विद्यालय मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क से घिरे हुए जगंलो के बीच स्थित है । बालाघाट जिले के बिरसा विकासखण्ड में आने वाले इन सरकारी स्कूलों की स्थापना आज से 100 वर्ष पूर्व हुई थी ,जहां आदिवासी समाज के बच्चे आज भी अपना जीवन संवारने इन विद्यालयों में शिक्षा दीक्षा प्राप्त करते है ।

साफ्टवेयर कंपनी यालामनचिली ने संवारी जिले की बिरसा तहसील की दस शालाओं की तस्वीर।


यालामंचिली कंपनी की मदद से मिले नालेज टर्मिनल एवं टी वी के माध्यम से इन शालाओं के बच्चे शिक्षकों के माध्यम से बताये गये अध्याय को बहुत ही अच्छी तरह समझते है। टी वी के माध्यम से बच्चे बहुत अच्छी तरह किताबों को पढ़ पाते है और उनकी लिखने की शैली में भी बहुत सुधार आया है। आनंद तब आया जब टीवी स्क्रीन पर चल रहे डेमो पर टीचर के साथ बच्चे भी वैसा ही करते नजर आए । इन बच्चों के शैक्षिक स्तर में इतना ज्यादा सुधार आया है कि आज इन विद्यालयों के बच्चे शासन द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग ले कर उन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने लगे है । इन विद्यालयों के 5 वी एवं 8 में अध्ययनरत बच्चे विभिन्न विशिष्ट विद्यालयों में प्रवश ले रहे है और शिक्षक सिर उठा कर गर्व से कहते है कि ’’मेरा विद्यालय बदल रहा है ’’।

यालामंचिली कंपनी के मालिक रामकृष्ण कान्हा पार्क के भ्रमण पर आते रहते है। उन्होंने चयनित शालाओं में दिये गये साफ्टवेयर, नालेज टर्मिनल, एलईडी टीव्ही एवं बैटरी में किसी तरह की समस्या आने पर सुधार कार्य के लिए अपने एक इंजीनियर की सेवायें भी उपलब्ध कराई है। रामकृष्ण ने इस क्षेत्र की दो और शालाओं को मदद के लिए चुना है। उनकी इच्छा इस क्षेत्र में कम्प्यूटर अधारित लायब्रेरी बनाने की है। जिसमें 10-20 कम्प्यूटर लगे हों और बच्चे उसका उपयोग अपने ज्ञानवर्धन के लिए कर सकें। 

यालामंचिली कंपनी के मालिक रामकृष्ण इस वर्ष अपने बेटे, बहु और अंग्रेज मित्र के साथ इन स्कूलों में पहुंचे थे और उन्होंने अपने परिजनों व मित्र को बताया कि उनके द्वारा की गई मदद से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल रही है।

यालामंचिली कंपनी ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, यूके, ब्राजिल, चीन, मलेसिया, सिंगापुर, हांगकांग, यूएसए, वियतनाम, फिजी, भूटान, तंजानिया, निदरलैंड, स्वीडन सहित 35 देंशों में अपने साफ्टवेयर दे रही हैं।

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