सड़कों पर तड़पती गौमाता और बिखरे शव, फिर सवालों के घेरे में ‘गौ-रक्षा’

सड़कों पर तड़पती गौमाता और बिखरे शव, फिर सवालों के घेरे में ‘गौ-रक्षा’

मऊगंज। सड़कों पर खुलेआम घूमता आवारा गोवंश और दुर्घटनाओं के बाद सड़क किनारे पड़े मृत एवं घायल पशु अब मऊगंज में व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। पूर्व विधायक सुखेंद्र सिंह बन्ना ने सड़क किनारे करीब आधा दर्जन गोवंश को मृत और क्षत-विक्षत हालत में देखकर इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया। घटना के बाद गौ-संरक्षण, गौशालाओं की व्यवस्था और पशुपालकों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सड़क किनारे एक कतार में पड़े गोवंश के शवों ने व्यवस्था की उस तस्वीर को सामने ला दिया, जिस पर अक्सर सरकारी योजनाओं और गौ-संरक्षण के दावों के बीच चर्चा होती है। सवाल यह है कि आखिर सड़कों पर इतनी संख्या में गोवंश पहुंच कैसे रहा है और दुर्घटना के बाद घायल पशुओं की देखभाल की जिम्मेदारी किसकी है?

गौशालाएं होने के बावजूद सड़क पर गोवंश क्यों?

मध्यप्रदेश में गौ-संरक्षण और गौशालाओं के संचालन के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित हैं। मऊगंज जिले में भी करीब 100 से अधिक गौशालाएं संचालित होने का दावा किया जाता है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में गोवंश सड़कों पर घूमता नजर आता है और दुर्घटनाओं का शिकार होता है, तो गौशालाओं की क्षमता, संचालन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि समस्या की पूरी जिम्मेदारी केवल प्रशासन पर डालना भी उचित नहीं होगा। पशुपालकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि उपयोगी और दूध देने वाले पशुओं को घर में रखा जाता है, जबकि उनके अनुपयोगी होने पर उन्हें खुले में छोड़ दिया जाता है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह पशु कल्याण के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का भी गंभीर विषय है।

आवारा गोवंश से हादसों का खतरा

सड़कों पर विचरण करता गोवंश केवल पशुओं के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि वाहन चालकों और राहगीरों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। विशेषकर रात के समय सड़क पर बैठे या खड़े पशु दिखाई नहीं देने से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। हादसे में घायल होने के बाद कई पशु लंबे समय तक उपचार के अभाव में सड़क पर ही पड़े रहते हैं और उनकी मौत हो जाती है।

सिर्फ गौशालाओं की संख्या नहीं, व्यवस्था की जांच जरूरी

अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन केवल गौशालाओं की संख्या के आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी वास्तविक क्षमता, चारा-पानी, उपचार व्यवस्था और वहां रखे गए गोवंश की संख्या की नियमित जांच करे। साथ ही सड़कों पर घूम रहे बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय तक पहुंचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। दूसरी ओर पशुपालकों को भी यह समझना होगा कि पशु के दूध देना बंद कर देने के बाद उसकी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। पशुपालन केवल आर्थिक लाभ का माध्यम नहीं, बल्कि पशु के प्रति जिम्मेदारी भी है।

नारे नहीं, जमीन पर दिखे गौ-संरक्षण

गौ-रक्षा केवल राजनीतिक मंचों, नारों और भाषणों का विषय नहीं हो सकती। यदि गौ-संरक्षण वास्तव में प्राथमिकता है तो उसका असर सड़कों पर दिखना चाहिए—जहां गोवंश सुरक्षित हो, घायल पशुओं को समय पर उपचार मिले और मृत पशुओं के शवों का सम्मानजनक निस्तारण हो। मऊगंज में सड़क किनारे पड़े गोवंश के शवों ने एक बार फिर यही सवाल सामने ला दिया है कि गौमाता के नाम पर योजनाएं और दावे तो बहुत हैं, लेकिन उनके सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की वास्तविक जिम्मेदारी कौन उठाएगा? अब निगाहें प्रशासन की कार्रवाई और गौशालाओं की जमीनी स्थिति पर हैं।



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