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| जीएमएच में फिर जच्चा-बच्चा की मौत, दो नर्सिंग ऑफिसर निलंबित; अब सवाल—हर बार जांच के बाद रिपोर्ट कब आएगी? |
रीवा। श्याम शाह मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी मेमोरियल अस्पताल (जीएमएच) में प्रसव के दौरान महिला और उसके नवजात बच्चे की मौत के बाद एक बार फिर अस्पताल की व्यवस्थाओं और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो गए हैं। परिजनों के हंगामे के बाद दो नर्सिंग ऑफिसरों को निलंबित किया गया और विभागाध्यक्ष स्तर की जांच समिति गठित कर दी गई। लेकिन इस कार्रवाई के साथ ही एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—क्या जांच समिति की रिपोर्ट भी उन पिछली जांचों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगी, या इस बार निष्पक्ष जांच का परिणाम जनता के सामने आएगा?
गांधी मेमोरियल अस्पताल विन्ध्य क्षेत्र का प्रमुख और सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा केंद्र माना जाता है। यहां रीवा ही नहीं, आसपास के कई जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों से गंभीर मरीज उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे अस्पताल में लगातार सामने आने वाली शिकायतें केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती हैं।
खबरें लगातार, जांच रिपोर्ट का इंतजार क्यों?
‘दैनिक आज तक 24’ समाचार पत्र द्वारा अस्पताल की व्यवस्थाओं और कथित अव्यवस्थाओं से संबंधित खबरें पहले भी लगातार प्रकाशित की जाती रही हैं। अस्पताल में मरीजों और परिजनों की शिकायतों, स्टाफ के व्यवहार तथा उपचार व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई मामलों में जांच की बात भी सामने आती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब तक कितनी जांचों की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और कितने मामलों में जिम्मेदारी तय हुई?
हर गंभीर घटना के बाद जांच समिति गठित होना जरूरी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जांच का उद्देश्य केवल समिति बनाना नहीं, बल्कि तथ्यों तक पहुंचना और जिम्मेदारी तय करना होना चाहिए।
हर घटना साजिश नहीं, लेकिन हर सवाल का जवाब जरूरी
जच्चा-बच्चा की मौत को लेकर परिजनों ने इलाज में कथित लापरवाही और स्टाफ के व्यवहार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं अस्पताल प्रबंधन का पक्ष है कि चिकित्सकों ने उपचार का प्रयास किया। ऐसे मामलों में बिना जांच किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। चिकित्सकीय परिस्थितियों में हर मौत को स्वतः लापरवाही नहीं माना जा सकता। लेकिन दूसरी तरफ यदि परिजन गंभीर आरोप लगाते हैं, दो कर्मचारियों को निलंबित किया जाता है और जांच समिति बनाई जाती है तो जांच के निष्कर्षों को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है। जब तक पोस्टमार्टम, मेडिकल रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक इसे साजिश या महज आकस्मिक दुर्घटना कहना भी जल्दबाजी होगी।
मौके पर पहुंचे जनप्रतिनिधियों को सूचना क्यों नहीं?
घटना के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि इतने बड़े अस्पताल में ऐसी गंभीर घटना के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों को समय पर सूचना क्यों नहीं दी गई। जीएमएच के आसपास ही कई जनप्रतिनिधियों के निवास हैं। इसके बावजूद अस्पताल की व्यवस्था और अव्यवस्था की जानकारी उन्हें घटना के बाद या विरोध प्रदर्शन के दौरान मिलती है तो यह प्रशासनिक संवाद व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल हंगामे के बाद मौके पर पहुंचकर आश्वासन देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें नियमित रूप से अस्पताल की व्यवस्थाओं, मरीजों की शिकायतों और लंबित जांचों की स्थिति की समीक्षा भी करनी चाहिए।
अब इस जांच की रिपोर्ट का इंतजार
दो नर्सिंग ऑफिसरों के निलंबन और जांच समिति के गठन के बाद अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। जांच में उपचार की पूरी प्रक्रिया, मेडिकल रिकॉर्ड, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की भूमिका तथा परिजनों के आरोपों की निष्पक्ष समीक्षा होना जरूरी है। सवाल सिर्फ एक परिवार को न्याय मिलने का नहीं है। सवाल यह है कि विन्ध के सबसे बड़े अस्पताल में बार-बार उठने वाली शिकायतों का स्थायी समाधान कब होगा? जांच समितियां बनती रहेंगी या उनकी रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्था भी बदलेगी? यही वह सवाल है जिसका जवाब अब अस्पताल प्रबंधन, मेडिकल कॉलेज प्रशासन और जिला प्रशासन—तीनों को देना होगा।
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