| पंचायत में पत्नी के नाम तालाब स्वीकृति पर सवाल, तत्कालीन सचिव की भूमिका जांच के घेरे में |
शहडोल/जयसिंहनगर - जनपद पंचायत जयसिंहनगर अंतर्गत ग्राम पंचायत बलौड़ी पश्चिम में शासकीय योजना के कथित दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितता का मामला एक बार फिर चर्चा में है। आरोप है कि वर्ष 2024-25 में तत्कालीन पंचायत सचिव ओमप्रकाश द्विवेदी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी मीना पति ओमप्रकाश द्विवेदी के नाम पर लघु तालाब स्वीकृत कराया। मामला सामने आने के बाद इसकी जांच भी हुई, लेकिन जांच के बाद कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ी, इसे लेकर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार, पंचायत में संचालित हितग्राहीमूलक योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने के बजाय कथित तौर पर ऐसे व्यक्ति को दिया गया, जिसका तत्कालीन पंचायत सचिव से पारिवारिक संबंध था। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल योजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि पद के दुरुपयोग और हितों के टकराव का गंभीर मामला भी बन सकता है।
पत्नी के नाम योजना, सचिव की भूमिका पर सवाल
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि यदि मीना पति ओमप्रकाश द्विवेदी के नाम पर लघु तालाब की स्वीकृति हुई थी तो उस समय पंचायत सचिव की भूमिका क्या थी? स्वीकृति प्रक्रिया में सचिव ने क्या प्रस्ताव तैयार किया, हितग्राही की पात्रता का सत्यापन किसने किया और योजना की राशि जारी करने से पहले संबंधित अधिकारियों ने किन दस्तावेजों की जांच की?
इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि तालाब वास्तव में मौके पर बना या नहीं, निर्माण की गुणवत्ता कैसी थी और इसके लिए कितनी राशि स्वीकृत एवं भुगतान की गई। यदि सरकारी रिकॉर्ड में कार्य पूर्ण दर्शाया गया है तो मौके पर उसका भौतिक सत्यापन भी आवश्यक है।
पहले भी हो चुकी है जांच
बताया जा रहा है कि मामला सामने आने के बाद तत्कालीन मनरेगा सहायक परियोजना अधिकारी मनोज मिश्रा द्वारा इसकी जांच की गई थी। हालांकि जांच के बाद क्या निष्कर्ष निकला और जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि अब पुरानी जांच भी सवालों के घेरे में है। यदि जांच में अनियमितता पाई गई थी तो संबंधितों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जांच में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं मिली थी तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर मामले को स्पष्ट क्यों नहीं किया गया? स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बाद जांच तो शुरू होती है, लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने से शिकायतें फाइलों में ही दबकर रह जाती हैं। इस मामले में भी ऐसी ही स्थिति होने का आरोप लगाया जा रहा है।
सरपंच और रोजगार सहायक की भूमिका भी जांचे जाने की मांग
लघु तालाब की स्वीकृति और निर्माण प्रक्रिया में तत्कालीन सरपंच एवं रोजगार सहायक की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन दोनों की संलिप्तता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में दस्तावेजों के आधार पर जांच जरूरी है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि योजना की स्वीकृति से लेकर मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान, सामग्री भुगतान, तकनीकी स्वीकृति, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और अंतिम भुगतान तक किन-किन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका रही।
‘दोहरे लाभ’ के आरोप ने बढ़ाई गंभीरता
मामले को लेकर सबसे गंभीर आरोप शासकीय योजना के दोहरे लाभ का है। यदि संबंधित हितग्राही ने पहले किसी योजना का लाभ लिया था और उसके बाद उसी उद्देश्य के लिए दूसरी योजना का लाभ प्राप्त किया, तो इसकी जांच जरूरी है। वहीं यदि तालाब की स्वीकृति नियमों के तहत हुई है तो संबंधित विभाग को दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
वर्तमान अधिकारी बोले—पुराना मामला है, जांच के बाद होगी कार्रवाई
मामले को लेकर अतिरिक्त परियोजना अधिकारी मनरेगा, जनपद पंचायत जयसिंहनगर अनुराग निगम से चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि यह मामला उनके कार्यकाल का नहीं है और पुराना है। उन्होंने बताया कि पहले तत्कालीन एपीओ मनोज मिश्रा द्वारा मामले की जांच की जा चुकी है, लेकिन उसके बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में बैठकें चल रही हैं। बैठक समाप्त होने के बाद मामले को देखा जाएगा और आवश्यकता होने पर संबंधितों को नोटिस जारी किया जाएगा।
अब जांच की निष्पक्षता पर टिकी नजर
मामला सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुरानी जांच रिपोर्ट को दोबारा खंगाला जाएगा या नहीं। यदि शासकीय राशि का गलत तरीके से उपयोग हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी तय कर राशि की वसूली और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप जांच में गलत पाए जाते हैं तो प्रशासन को स्पष्ट रिपोर्ट सामने रखनी चाहिए। बलौड़ी पश्चिम के इस मामले में अब ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं की नजर इस बात पर है कि जांच केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में दस्तावेजों, मौके की स्थिति और भुगतान रिकॉर्ड की पड़ताल कर जिम्मेदारी तय की जाती है।