राजनीतिक रसूख की जनचर्चा ने उठाए गंभीर सवाल, जनता पूछ रही—सरकारी संस्थान आम आदमी के लिए हैं या प्रभावशाली लोगों के लिए?

राजनीतिक रसूख की जनचर्चा ने उठाए गंभीर सवाल, जनता पूछ रही—सरकारी संस्थान आम आदमी के लिए हैं या प्रभावशाली लोगों के लिए?

मऊगंज। नवीन जिला मऊगंज में इन दिनों राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच एक चर्चा तेजी से जोर पकड़ रही है। सवाल यह है कि क्या थाना, तहसील और सरकारी कार्यालय अब आम जनता की समस्याओं के समाधान के केंद्र होने के बजाय राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों की आवाजाही और स्वागत-सत्कार के लिए चर्चित हो रहे हैं? इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि जनता के बीच ऐसी धारणा लगातार बन रही है तो यह प्रशासन और पुलिस व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में थाना किसी राजनीतिक दल का कार्यालय नहीं और सरकारी कार्यालय किसी जनप्रतिनिधि का निजी दरबार नहीं होता। इन संस्थानों का उद्देश्य हर नागरिक को कानून के अनुसार सुरक्षा, न्याय और सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना है। जनप्रतिनिधियों का अधिकारियों से मिलना और जनता की समस्याएं रखना पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के आधार पर किसी नागरिक को विशेष सुविधा या सामान्य नागरिक की उपेक्षा होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

जब जनप्रतिनिधि जनता के बीच खड़े होते थे

विंध्य की राजनीति में ऐसे दौर भी रहे हैं जब जनप्रतिनिधियों ने सत्ता में रहते हुए भी प्रशासन से संवाद को प्राथमिकता दी। वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष पंडित श्रीनिवास तिवारी को करीब से देखने वालों के अनुसार वे आवश्यक मामलों में अधिकारियों से संवाद के माध्यम से समस्याओं के समाधान का प्रयास करते थे। इसी तरह पूर्व सांसद चंद्रमा त्रिपाठी भी गंभीर जनसमस्याओं के समय आम लोगों के साथ खड़े दिखाई देते थे। उस दौर में संसाधन सीमित थे। मोबाइल फोन का प्रचलन नहीं था और अधिकारियों से संवाद के लिए लैंडलाइन फोन या प्रत्यक्ष मुलाकात ही प्रमुख माध्यम थे। लेकिन राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की आवाज उठाना माना जाता था।आज तकनीक ने संवाद आसान कर दिया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधियों की सरकारी कार्यालयों में मौजूदगी जनता की समस्याओं के समाधान तक सीमित है या कहीं-कहीं राजनीतिक प्रभाव की छाप भी दिखाई देने लगी है?

थाना किसके लिए है?

थाना उस आम नागरिक के लिए पहला सहारा है, जिसके साथ अपराध हुआ है। गरीब हो या प्रभावशाली, किसान हो या व्यापारी, सत्ता पक्ष का समर्थक हो या विपक्ष का—कानून सभी के लिए समान होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को यह महसूस होने लगे कि उसकी शिकायत से पहले यह देखा जा रहा है कि सामने वाला कितना प्रभावशाली है, तो पुलिस व्यवस्था पर उसका विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है। किसी जनप्रतिनिधि का थाने जाना गलत नहीं है। वे जनता की शिकायत लेकर जा सकते हैं, पुलिस अधिकारियों से जानकारी मांग सकते हैं और कानून के दायरे में कार्रवाई की मांग कर सकते हैं। लेकिन सरकारी कार्रवाई का आधार किसी व्यक्ति का राजनीतिक प्रभाव नहीं, बल्कि कानून और तथ्य होने चाहिए।

‘सफेद कुर्ते’ की मौजूदगी पर क्यों होती है चर्चा?

मऊगंज के कुछ सरकारी कार्यालयों और थानों को लेकर जनचर्चा में राजनीतिक प्रभाव रखने वाले लोगों की आवाजाही और विशेष महत्व दिए जाने की बातें सामने आती रहती हैं। इन बातों को तथ्य मानने से पहले उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। लेकिन ऐसी चर्चाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी सरकारी कार्यालय में आम फरियादी को यह महसूस न हो कि प्रभावशाली व्यक्ति के सामने उसकी समस्या छोटी पड़ गई है। सरकारी कार्यालयों में सम्मान सभी का होना चाहिए, लेकिन विशेषाधिकार केवल कानून और नियमों के आधार पर होना चाहिए।

पदस्थापना को लेकर भी सवाल

अधिकारियों और कर्मचारियों की पदस्थापना को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक अनुशंसा और प्रभाव की चर्चाएं सुनाई देती हैं। यदि जनता के बीच यह धारणा बनने लगे कि किसी अधिकारी की कुर्सी किसी ‘माननीय’ की कृपा पर टिकी है, तो इसका असर प्रशासनिक निष्पक्षता पर पड़ सकता है। पदस्थापना का आधार प्रशासनिक आवश्यकता, योग्यता और शासन के नियम होने चाहिए। अधिकारी को यह भरोसा होना चाहिए कि वह बिना किसी अनुचित दबाव के कानून के अनुसार निर्णय ले सकता है। इसी तरह जनप्रतिनिधियों को भी यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें सेवा के लिए चुना है, प्रशासनिक संस्थाओं पर व्यक्तिगत नियंत्रण के लिए नहीं।

जनता सर्वोच्च है

चुनाव में कोई व्यक्ति जीतता है तो वह केवल अपने समर्थकों का प्रतिनिधि नहीं रहता। वह पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधि बन जाता है। इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारी भी किसी दल या नेता के नहीं, बल्कि शासन और संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं। लोकतंत्र में सत्ता और प्रशासन के बीच स्वस्थ दूरी जरूरी है। जनप्रतिनिधि जनता की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचाएं और अधिकारी उन समस्याओं पर कानून के अनुसार निर्णय लें—यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का संतुलन है।

भय नहीं, भरोसा होना चाहिए

कई बार आम नागरिकों के बीच यह भय देखने को मिलता है कि यदि उन्होंने किसी अधिकारी, कर्मचारी या प्रभावशाली व्यक्ति के व्यवहार पर सवाल उठाया तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। ऐसी धारणा लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। पुलिस का काम नागरिकों में भय पैदा करना नहीं, बल्कि कानून का पालन कराते हुए उन्हें सुरक्षा देना है। प्रशासन का काम शिकायतकर्ता की आवाज सुनना और नियमानुसार समाधान करना है।

थाना और कार्यालय ‘दरबार’ नहीं, जनसेवा केंद्र बनें

मऊगंज को एक नए जिले के रूप में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने का अवसर मिला है। ऐसे समय में यह जरूरी है कि सरकारी संस्थानों की पहचान किसी राजनीतिक दरबार के रूप में नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और जनसेवा के केंद्र के रूप में बने। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, गरीब हो या प्रभावशाली, महिला हो या पुरुष—हर नागरिक को समान सम्मान और कानून के अनुसार समान अधिकार मिलना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को जनता की आवाज बनना चाहिए और अधिकारियों को कानून की आवाज। जब दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएंगे, तभी जनता का भरोसा मजबूत होगा। विंध्य वसुंधरा समाचार की जनपक्षीय अपील यही है कि अधिकारी ऐसा आचरण करें जिससे जनता का विश्वास कायम रहे और जनप्रतिनिधि ऐसा व्यवहार करें जिससे लोगों को अपने लोकतंत्र पर गर्व हो। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत किसी कुर्सी, बंगले या राजनीतिक प्रभाव में नहीं, बल्कि उस आम नागरिक के विश्वास में है जो अपनी समस्या लेकर सरकारी दरवाजे पर पहुंचता है और उम्मीद करता है कि यहां उसकी बात बिना किसी भेदभाव के सुनी जाएगी।


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