कई दिनों बाद मैदान में उतरे कलेक्टर, पर सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों तक क्यों नहीं पहुंचे?

कई दिनों बाद मैदान में उतरे कलेक्टर, पर सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों तक क्यों नहीं पहुंचे?

मऊगंज/नईगढ़ी - भारी बारिश और जलभराव से मऊगंज जिले के कई गांवों में जनजीवन अस्त-व्यस्त होने के बाद आखिरकार जिला प्रशासन का अमला मैदान में नजर आया। कलेक्टर संजय कुमार जैन और पुलिस अधीक्षक ने ग्राम पंचायत कोट सहित कुछ क्षेत्रों का भ्रमण कर राहत एवं बचाव व्यवस्थाओं का जायजा लिया। प्रशासन ने इसे प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण बताया है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह दौरा वास्तव में आपदा की पूरी भयावहता जानने के लिए था या चुनिंदा स्थानों के निरीक्षण तक सीमित रह गया? प्रशासनिक जानकारी के अनुसार कलेक्टर ने ग्राम पंचायत कोट पहुंचकर जलभराव की स्थिति देखी, राहत शिविर का निरीक्षण किया तथा भोजन, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं की जानकारी ली। आंगनबाड़ी केंद्र और उचित मूल्य की दुकान का भी निरीक्षण किया गया। अधिकारियों को प्रभावित परिवारों तक खाद्यान्न और जरूरी सामग्री पहुंचाने के निर्देश दिए गए।

सवाल यह है—सबसे ज्यादा तबाही वाले गांव दौरे से बाहर क्यों?

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि जरकटी, कशियार और छात्रगढ़ कला जैसे गांव बारिश से कहीं अधिक प्रभावित हुए हैं। छात्रगढ़ कला की आदिवासी बस्ती में अनेक परिवारों के घर प्रभावित होने और लोगों के बेघर होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि उद्देश्य आपदा की वास्तविक स्थिति जानना था, तो प्रशासनिक काफिला इन गंभीर रूप से प्रभावित बस्तियों तक क्यों नहीं पहुंचा? ग्राम पंचायत कोट में निरीक्षण निश्चित रूप से जरूरी था, लेकिन प्रशासन को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि जिले में कितने गांव प्रभावित हुए, कितने मकान पूर्ण या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए, कितने परिवारों को राहत शिविरों में रखा गया और अब तक कितने परिवारों को वास्तविक सहायता दी गई।

दो किलोमीटर दूर कथित भ्रष्टाचार से घिरा सरोवर, वहां क्यों नहीं पहुंचे?

कलेक्टर के दौरे के बाद एक और सवाल जोर पकड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाया जा रहा है कि कोट से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर जोधपुर में मुख्यमंत्री सरोवर निर्माण की गुणवत्ता और व्यय को लेकर पहले से गंभीर शिकायतें हैं। बारिश के बाद निर्माण की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में जब जिले का शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी इसी क्षेत्र में मौजूद था, तो कथित अनियमितताओं से जुड़े इस निर्माण का मौके पर निरीक्षण क्यों नहीं किया गया? यदि शिकायतें निराधार हैं तो प्रशासन जांच कर स्थिति स्पष्ट करे और यदि सरकारी राशि के दुरुपयोग अथवा घटिया निर्माण के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदार एजेंसी, अधिकारी और ठेकेदार के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

निर्देश बहुत हुए, अब पीड़ितों को परिणाम का इंतजार

कलेक्टर ने अधिकारियों को राहत शिविर में किसी प्रकार की असुविधा नहीं होने देने, प्रभावित परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने और मैदानी अमले को लगातार सक्रिय रहने के निर्देश दिए हैं। देवतालाब मंदिर परिसर में भी जलभराव और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया गया। लेकिन आपदा से जूझ रहे ग्रामीणों के लिए अब निर्देशों से ज्यादा जमीन पर परिणाम महत्वपूर्ण हैं। जिनका मकान गिरा, उन्हें तत्काल सहायता कब मिलेगी? जिनके घरों में पानी घुसा और अनाज व घरेलू सामान खराब हुआ, उनका सर्वे कब पूरा होगा? बेघर परिवारों के पुनर्वास की क्या योजना है? नुकसान का मुआवजा कब तक मिलेगा? इन प्रश्नों का जवाब प्रशासन को समयबद्ध तरीके से देना होगा।

भ्रष्टाचार की शिकायतों पर भी टूटे प्रशासन का मौन

बारिश केवल प्राकृतिक आपदा नहीं लाई, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में हुए कई निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े कर गई है। सड़क, पुल-पुलिया, तालाब और अन्य सरकारी निर्माण यदि पहली तेज बारिश में क्षतिग्रस्त होते हैं, तो उनकी तकनीकी जांच और जिम्मेदारी तय करना प्रशासन का दायित्व है। कलेक्टर का मैदान में निकलना राहत की बात जरूर है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि दौरे के बाद कितने पीड़ितों को राहत मिली और कथित भ्रष्टाचार व घटिया निर्माण की कितनी शिकायतों पर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई हुई। फिलहाल जनता का सवाल सीधा है—क्या यह निरीक्षण व्यवस्था में वास्तविक सुधार की शुरुआत है, या तस्वीरों और निर्देशों के बाद हालात फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगे? निरीक्षण के दौरान एसडीएम मऊगंज रश्मि चतुर्वेदी, जनपद पंचायत नईगढ़ी की सीईओ ऊषा किरण गुप्ता, तहसीलदार सहित अन्य विभागीय अधिकारी और मैदानी अमला मौजूद रहा।

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