| मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में ‘कुर्सी’ पर उठे सवाल, नेताओं के लिए जगह रही, कलेक्टर-आयुक्त को नहीं मिली सीट |
रीवा - मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से सामने आई एक तस्वीर ने प्रशासनिक गरिमा, प्रोटोकॉल और राजनीतिक संस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तस्वीर में मुख्यमंत्री के साथ बैठने के लिए नेताओं के लिए कुर्सियां उपलब्ध दिखाई दे रही हैं, जबकि जिले के कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बैठने तक की व्यवस्था नजर नहीं आती। यह दृश्य महज कुर्सी की कमी का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक पद की गरिमा और निर्धारित प्रोटोकॉल के सम्मान से जुड़ा सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री के किसी जिले में आगमन के दौरान आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारी कार्यक्रम की व्यवस्थाओं, कानून-व्यवस्था, विकास कार्यों और स्थानीय समस्याओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। ऐसे में जिले के कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं होती, बल्कि वे शासन और प्रशासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनके लिए उचित स्थान और सम्मानजनक व्यवस्था को प्रशासनिक शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है।
फोटो खिंचवाने की होड़ पर भी उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक अन्य गंभीर चर्चा को भी जन्म दिया है। राजनीतिक कार्यक्रमों में वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवाने की होड़ अब आम दृश्य बनती जा रही है। किसी बड़े जनप्रतिनिधि के आगमन के साथ ही अनेक स्थानीय नेता और पदाधिकारी उनके आसपास दिखाई देने लगते हैं। कई बार जनसमस्याओं और प्रशासनिक मुद्दों पर होने वाली बैठकों का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है और मंच तथा आसपास का क्षेत्र फोटो खिंचवाने की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन जाता है। जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मुख्यमंत्री के साथ बैठक का उद्देश्य जिले की समस्याओं, विकास योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करना है, तो उस बैठक में प्राथमिकता किन लोगों को मिलनी चाहिए? क्या उन अधिकारियों को उचित स्थान नहीं मिलना चाहिए, जो जिले की वास्तविक स्थिति, योजनाओं की प्रगति और जनता से जुड़े मुद्दों की तथ्यात्मक जानकारी मुख्यमंत्री के सामने रखते हैं?
‘फोटो राजनीति’ से बचने की जरूरत
राजनीतिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों का सम्मान और उनकी भागीदारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन जब किसी कार्यक्रम में केवल तस्वीर में दिखाई देने की होड़ व्यवस्था और प्रोटोकॉल पर भारी पड़ने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों के साथ फोटो खिंचवाना यदि राजनीतिक उपलब्धि का प्रतीक बन जाए और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका गौण दिखाई देने लगे, तो यह व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी प्रश्न खड़ा करता है। विशेषकर मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक एवं उच्च पद पर आसीन व्यक्ति के कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल, अनुशासन और पद की गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। मंच व्यवस्था से लेकर बैठने की व्यवस्था तक प्रत्येक पहलू पहले से निर्धारित और स्पष्ट होना चाहिए, ताकि किसी भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को असहज स्थिति का सामना न करना पड़े।
जनता की निगाह में पूरा घटनाक्रम
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम की तस्वीर कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे में एक छोटी-सी व्यवस्था संबंधी चूक भी बड़ी चर्चा का विषय बन जाती है। मुख्यमंत्री के साथ नेताओं के लिए कुर्सियां और जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के लिए स्थान का अभाव दिखाई देने वाली तस्वीर ने भी यही किया है। जनता अब सवाल पूछ रही है कि क्या सत्ता के सामने प्रशासनिक अधिकारियों की गरिमा इतनी गौण हो गई है कि जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी उचित स्थान सुनिश्चित नहीं किया जा सका?
आगे व्यवस्था पर ध्यान देने की जरूरत
यह किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान या अपमान का विषय बनाने के बजाय व्यवस्था से सीख लेने का अवसर है। भविष्य में मुख्यमंत्री, मंत्री अथवा किसी वरिष्ठ जनप्रतिनिधि के कार्यक्रम में बैठने की व्यवस्था और प्रोटोकॉल का स्पष्ट पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। राजनीतिक पदाधिकारियों की सहभागिता आवश्यक है, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका और गरिमा से समझौता नहीं होना चाहिए। साथ ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय पदाधिकारियों को भी यह समझने की जरूरत है कि किसी वरिष्ठ नेता के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवा लेना ही सार्वजनिक जीवन की उपलब्धि नहीं है। जनता की समस्याओं को सामने रखना, विकास कार्यों की निगरानी करना और प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित करना ही जनप्रतिनिधित्व की वास्तविक जिम्मेदारी है। तस्वीरें क्षणिक होती हैं, लेकिन व्यवस्था की छवि लंबे समय तक जनता के मन में रहती है। इसलिए भविष्य में ‘फोटो खिंचवाने की होड़’ से अधिक प्राथमिकता प्रोटोकॉल, प्रशासनिक गरिमा और जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों को दी जानी चाहिए। कलेक्टर रीवा जनप्रतिनिधियों से अधिक प्रिय हैं यह जनता का झुकाव और भीड़ सिद्ध करती है देश में पीएम प्रधानमंत्री प्रदेश में सीएम मुख्यमंत्री और जिले में डीएम कलेक्टर काफी जिम्मेदार माने जाते हैं कलेक्टर का अपमान रीवा की जनता में बना चर्चा का विषय क्योंकि अपने चाहते कलेक्टर के साथ इस तरह का व्यवहार जनता बर्दाश्त नहीं कर पा रही सत्ता में बैठे हुए लोग 50% से कम वोट पाकर जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और कलेक्टर शत प्रतिशत लोगों का विश्वास अर्जित करते हैं