| राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा गोवंश बने जानलेवा चुनौती, गौशालाओं पर करोड़ों खर्च के बावजूद सड़कों पर क्यों भटक रहा पशुधन? |
रीवा/मऊगंज - मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गोवंश संरक्षण और गौशालाओं के संचालन के नाम पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये भोजन, रखरखाव और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च किए जा रहे हैं। सरकार की मंशा निश्चित रूप से गोवंश संरक्षण की है, लेकिन रीवा और नवीन मऊगंज जिले की जमीनी तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। राष्ट्रीय राजमार्ग-135 तथा राष्ट्रीय राजमार्ग-30 सहित प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में गोवंश खुलेआम सड़कों पर घूमते दिखाई दे रहे हैं। कई स्थानों पर यही आवारा पशु सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं, जिससे वाहन चालक घायल हो रहे हैं और कई परिवारों के घरों के चिराग बुझने की घटनाएं सामने आती रही हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-135 हनुमना-मिर्जापुर की दिशा में जाने वाले मार्ग तथा राष्ट्रीय राजमार्ग-30 मऊगंज से चाकघाट और प्रयागराज सीमा की ओर जाने वाले मार्ग पर सड़क किनारे गोवंश का जमावड़ा राहगीरों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। विशेषकर रात के समय तेज रफ्तार वाहनों की हेडलाइट में अचानक सड़क पर बैठे या खड़े पशु दिखाई नहीं देने से दुर्घटना की आशंका और बढ़ जाती है। मोटरसाइकिल सवारों के लिए स्थिति और भी खतरनाक है।
गौशालाओं पर खर्च के बावजूद सड़कों पर गोवंश क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार गोवंश संरक्षण के लिए गौशालाओं पर बड़ी धनराशि खर्च कर रही है, तो दूध देना बंद कर चुके या अनुपयोगी समझे जाने वाले पशु आखिर सड़कों पर कैसे पहुंच रहे हैं? ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यह शिकायत सामने आती है कि जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो कुछ पशुपालक उन्हें खुले में छोड़ देते हैं। इसके बाद ये पशु गांवों की गलियों से निकलकर मुख्य सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों तक पहुंच जाते हैं। यह स्थिति केवल पशुओं के लिए ही संकट नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन चुकी है। सड़क पर पड़े मृत या घायल गोवंश से दुर्घटना की आशंका बनी रहती है और कई बार वाहन चालक अचानक ब्रेक लगाने या पशु से बचने के प्रयास में अनियंत्रित होकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।
सड़क से हटाए गए पशुओं का उचित प्रबंधन जरूरी
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि राजमार्गों पर मृत या घायल पशुओं को हटाकर सड़क किनारे डाल दिया जाता है। यदि ऐसी स्थिति कहीं सामने आती है तो संबंधित एजेंसियों को तत्काल और संवेदनशील तरीके से उसका निस्तारण सुनिश्चित करना चाहिए। सड़क किनारे पड़े पशुओं से दुर्गंध फैलने के साथ-साथ राहगीरों को असुविधा होती है और संक्रमण तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है। राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव की जिम्मेदारी निभाने वाली एजेंसियों तथा प्रशासन को केवल सड़क की गुणवत्ता, टोल वसूली और यातायात व्यवस्था तक सीमित न रहकर सड़क सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर मानवीय और पशु कल्याण के मुद्दे पर भी प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।
धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय, लेकिन व्यवस्था में भी चाहिए जवाबदेही
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ी है। सनातन परंपरा में गाय को विशेष स्थान प्राप्त है। गोबर और गोमूत्र के पारंपरिक उपयोग से लेकर दुग्ध उत्पादन तक, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गोवंश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी वजह से जब सरकार गोवंश संरक्षण की बात करती है तो लोगों की अपेक्षा केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहती। आम नागरिक चाहता है कि गौशालाएं वास्तव में गोवंश के संरक्षण और संवर्धन का केंद्र बनें, न कि केवल बैठकों और सरकारी व्यवस्थाओं तक सीमित संस्थान।
किसानों को सीधे सहायता देने पर भी हो सकता है समाधान
गोवंश संरक्षण की वर्तमान व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यदि सरकार गौशालाओं पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा ऐसे पशुपालकों और किसानों को प्रत्यक्ष सहायता के रूप में उपलब्ध कराए, जो अपने गोवंश का जिम्मेदारी से पालन करते हैं, तो पशुओं को खुले में छोड़ने की प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। यदि पात्र गोपालकों को प्रति पशु प्रतिदिन निश्चित राशि उपलब्ध कराई जाए और इसके साथ पशु की पहचान, नियमित सत्यापन तथा निगरानी की व्यवस्था की जाए, तो किसान के लिए गाय को रखना आर्थिक रूप से भी उपयोगी हो सकता है। इससे दूध देना बंद कर चुके पशु को छोड़ने की मजबूरी या प्रवृत्ति दोनों को कम किया जा सकता है।
संभागीय आयुक्त और कलेक्टर कराएं विशेष जांच
रीवा संभागीय आयुक्त तथा रीवा और मऊगंज जिला प्रशासन को राष्ट्रीय राजमार्ग-30 और राष्ट्रीय राजमार्ग-135 सहित प्रमुख सड़कों का विशेष निरीक्षण कराना चाहिए। प्रशासन को यह पता लगाना चाहिए कि किन स्थानों पर सबसे अधिक गोवंश सड़कों पर एकत्रित हो रहा है, किन स्थानों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं और दुर्घटनाओं के बाद घायल अथवा मृत पशुओं के निस्तारण की व्यवस्था क्या है। साथ ही प्रत्येक गौशाला की वास्तविक क्षमता, वहां मौजूद गोवंश की संख्या, उपलब्ध चारा, चिकित्सा सुविधा, कर्मचारियों की संख्या और सरकारी मद से खर्च की जा रही राशि का भौतिक सत्यापन भी किया जाना चाहिए। यदि कागजों में संचालित गौशालाओं और जमीन पर मौजूद व्यवस्था में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई होनी चाहिए।
विकास के साथ जीवन और पशुधन की सुरक्षा भी जरूरी
राष्ट्रीय राजमार्गों का बेहतर निर्माण विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। टोल व्यवस्था के माध्यम से सरकार और संबंधित एजेंसियां राजस्व भी प्राप्त करती हैं। लेकिन विकास की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब सड़क पर चलने वाला इंसान और उस सड़क के आसपास रहने वाला पशुधन दोनों सुरक्षित रहें। एक ओर सरकार सड़क निर्माण और अधोसंरचना पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर यदि उन्हीं सड़कों पर आवारा गोवंश के कारण लगातार दुर्घटनाओं का खतरा बना रहे तो यह व्यवस्था की गंभीर विसंगति है। अब आवश्यकता केवल गौशालाओं की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि गोवंश संरक्षण की पूरी व्यवस्था की समीक्षा करने की है। पशुपालक की जिम्मेदारी तय हो, गौशालाओं की नियमित निगरानी हो, राष्ट्रीय राजमार्गों पर पशुओं को रोकने की प्रभावी व्यवस्था हो और दुर्घटना संभावित स्थानों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। सरकार यदि गोवंश को धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालक की आजीविका से जोड़कर व्यावहारिक नीति बनाए, तो सड़कों पर भटकते गोवंश की समस्या का स्थायी समाधान संभव है। वरना एक ओर गौ संरक्षण के नाम पर सरकारी धन खर्च होता रहेगा और दूसरी ओर वही गोवंश राष्ट्रीय राजमार्गों पर इंसानों तथा स्वयं उनके लिए जानलेवा खतरा बना रहेगा।