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| मौत के बाद भी नहीं रुकी रिश्वत की मांग! पेंशन और अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर जल संसाधन विभाग का बाबू लोकायुक्त के शिकंजे में |
रीवा - रीवा में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी है। ताजा मामले में लोकायुक्त टीम ने जल संसाधन विभाग के एक बड़े बाबू को ₹7 हजार की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। आरोप है कि मृत कर्मचारी के परिवार से पेंशन प्रकरण, अनुकंपा नियुक्ति और अन्य विभागीय कार्यों को आगे बढ़ाने के नाम पर लगातार रिश्वत मांगी जा रही थी। कार्रवाई बाणसागर कॉलोनी स्थित जल संसाधन विभाग कार्यालय के समीप की गई, जहां आरोपी जैसे ही रिश्वत की राशि लेने पहुंचा, पहले से घात लगाए बैठी लोकायुक्त टीम ने उसे दबोच लिया। रासायनिक परीक्षण में आरोपी के हाथों पर रिश्वत की राशि के रासायनिक निशान भी पाए गए।
जानकारी के अनुसार गिरफ्तार आरोपी रामनारायण मिश्रा जल संसाधन विभाग में आमीन (बड़े बाबू) के पद पर पदस्थ है। शिकायतकर्ता मोनू नापेश ने लोकायुक्त को बताया कि उनके पिता जल संसाधन विभाग के त्यौथर क्षेत्र में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लंबे समय तक जूझने के बाद 24 मार्च 2026 को उनका निधन हो गया। पिता की बीमारी के इलाज में परिवार पहले ही कर्ज में डूब चुका था। ऐसे कठिन समय में परिवार को उम्मीद थी कि विभाग से मिलने वाली पेंशन और अनुकंपा नियुक्ति के जरिए कुछ राहत मिलेगी, लेकिन इसके उलट उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े।
फरियादी का आरोप है कि जब उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करनी चाही, तो आरोपी बाबू ने पहले यह कहकर उन्हें गुमराह किया कि इस मामले में कोई नियम ही नहीं है। बाद में उन्हें स्वयं भोपाल जाकर मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों से जानकारी जुटानी पड़ी। जब आरोपी को पता चला कि फरियादी नियमों की जानकारी हासिल कर चुका है, तब उसने अपने माध्यम से ही आवेदन कराने और फाइल आगे बढ़ाने के नाम पर ₹35 हजार से ₹40 हजार तक की रिश्वत की मांग शुरू कर दी।
इतना ही नहीं, मृतक कर्मचारी की पत्नी के पेंशन प्रकरण में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने के लिए भी आरोपी ने ₹10 हजार की मांग की। शिकायतकर्ता का कहना है कि सरकारी काम रुकने के डर और परिवार की मजबूरी के कारण वह पहले भी आरोपी को अलग-अलग किस्तों में ₹5 हजार दे चुका था। इसके बाद आरोपी लगातार फोन कर ₹7 हजार और देने का दबाव बना रहा था।
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि मृत कर्मचारी के अंतिम संस्कार और कर्मकांड के लिए विभाग की ओर से स्वीकृत लगभग ₹1.25 लाख की सहायता राशि जारी कराने में भी कथित रूप से रिश्वत मांगी गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस भुगतान के एवज में भी आरोपी ने ₹5 हजार वसूल लिए थे। यानी परिवार जिस समय आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहा था, उसी समय उसे विभागीय भ्रष्टाचार का भी सामना करना पड़ा।
फरियादी ने आरोपी द्वारा रिश्वत मांगने की बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सुरक्षित रखी थी। उसने बताया कि हाल ही में वह अपनी बहन के दस्तावेज तैयार कराने के लिए दिल्ली गया हुआ था, तब भी आरोपी लगातार फोन कर पहले पैसे देने और बाद में काम करने की बात कह रहा था। लगातार हो रही मांगों से परेशान होकर उसने लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक रीवा से शिकायत की।
लोकायुक्त टीम ने शिकायत का गोपनीय सत्यापन किया। आरोप सही पाए जाने पर योजनाबद्ध तरीके से ट्रैप की कार्रवाई की गई। तय योजना के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोपी को ₹7 हजार की रिश्वत दी और जैसे ही उसने राशि स्वीकार की, लोकायुक्त टीम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया। इसके बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर आगे की वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
यह कार्रवाई केवल एक बाबू की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर भी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या किसी कर्मचारी के निधन के बाद उसके परिवार को मिलने वाले वैधानिक अधिकार भी रिश्वत के बिना पूरे नहीं हो सकते? यदि पेंशन, अनुकंपा नियुक्ति और सहायता राशि जैसे संवेदनशील मामलों में भी भ्रष्टाचार हो रहा है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक स्थिति है।
दैनिक आज तक लगातार भ्रष्टाचार के मामलों को प्रमुखता से उठाता रहा है। जब देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री और संबंधित विभाग भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बात करते हैं, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या केवल रिश्वत लेते पकड़े गए कर्मचारी पर कार्रवाई ही पर्याप्त है, या फिर ऐसे मामलों में संबंधित कार्यालय प्रमुख और विभागीय निगरानी तंत्र की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए? यदि शीर्ष स्तर पर भी जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, तभी भ्रष्टाचार पर प्रभावी और स्थायी अंकुश लगाया जा सकता है।
