| अनुबंध दरकिनार, भुगतान पर ताला! शहडोल सिविल सप्लाइज में किसके इशारे पर बदला परिवहन का खेल? |
शहडोल - मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन, जिला शहडोल में एचएलआरटी (Higher Loading & Road Transport) परिवहन कार्य को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। विभाग के अनुबंधित परिवहनकर्ता विकास रोड लाइंस ने जिला प्रबंधक को लिखित शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि वैध अनुबंध प्रभावी होने, निर्धारित सुरक्षा राशि (Security Deposit) जमा होने तथा सभी शर्तों का पालन करने के बावजूद उन्हें बिना किसी लिखित आदेश, नोटिस या कारण बताए परिवहन कार्य से अलग कर दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि उनके स्थान पर जय श्रीराम ट्रांसपोर्ट को "वैकल्पिक व्यवस्था" के नाम पर परिवहन कार्य सौंप दिया गया। मामले ने अब केवल भुगतान विवाद का स्वरूप नहीं रखा है, बल्कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया, अनुबंधों की वैधता और विभागीय पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
अनुबंध प्रभावी था, फिर भी क्यों हटाया गया परिवहनकर्ता?
शिकायत के अनुसार विकास रोड लाइंस विभाग का विधिवत चयनित एवं अनुबंधित HLRT परिवहनकर्ता है। कंपनी ने अनुबंध की सभी शर्तों का पालन करते हुए निर्धारित प्रतिभूति राशि भी जमा कराई और विभाग के निर्देशानुसार लगातार परिवहन कार्य किया। शिकायतकर्ता का कहना है कि कार्य के दौरान किसी प्रकार की लापरवाही, अनुबंध उल्लंघन या कार्य करने से इंकार जैसी कोई स्थिति कभी उत्पन्न नहीं हुई। इसके बावजूद जब कंपनी ने अपने लंबित भुगतान की मांग की तो मौखिक रूप से बताया गया कि अब परिवहन कार्य किसी अन्य परिवहनकर्ता से कराया जा रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्हें न तो कोई कारण बताया गया और न ही अनुबंध समाप्त किए जाने संबंधी कोई लिखित आदेश उपलब्ध कराया गया।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि जब अनुबंध प्रभावी था और परिवहनकर्ता कार्य करने के लिए उपलब्ध था, तब उसे किन नियमों के तहत कार्य से अलग किया गया?
भुगतान मांगते ही बदल गई पूरी व्यवस्था?
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जैसे ही विभाग से लंबित भुगतान की मांग की गई, उसके बाद अचानक विभाग ने "वैकल्पिक व्यवस्था" का हवाला देते हुए दूसरे परिवहनकर्ता को कार्य देना शुरू कर दिया। यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल भुगतान रोकने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्षता और विभागीय कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। शिकायतकर्ता का कहना है कि लंबित भुगतान आज भी जारी नहीं किया गया है, जिससे आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।
क्या टेंडर प्रक्रिया और नियमों का पालन किया गया?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे हैं। यदि किसी कारणवश विभाग अनुबंधित (L-1) परिवहनकर्ता से कार्य नहीं कराना चाहता था, तो क्या नियमानुसार L-2 अथवा L-3 पात्र परिवहनकर्ताओं को अवसर दिया गया?
क्या इस संबंध में नया आदेश जारी किया गया?
क्या अन्य पात्र परिवहनकर्ताओं से सहमति या प्रस्ताव मांगे गए?
क्या सक्षम अधिकारी से वैकल्पिक व्यवस्था की पूर्व अनुमति प्राप्त की गई?
क्या पूरे मामले की जानकारी कॉर्पोरेशन के उच्च अधिकारियों को दी गई?
यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर दूसरे परिवहनकर्ता को किस नियम, किस आदेश और किस प्रशासनिक आधार पर परिवहन कार्य सौंपा गया।
शिकायत में उठाए गए कई अहम सवाल
शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में विभाग के समक्ष कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाए हैं। उनका कहना है कि—
- बिना किसी लिखित नोटिस के अनुबंधित परिवहनकर्ता को कार्य से क्यों हटाया गया?
- क्या विभागीय रिकॉर्ड में कहीं यह उल्लेख है कि परिवहनकर्ता ने कार्य करने से मना किया था?
- अब तक कुल कितनी रैकों का परिवहन कार्य कराया गया और उसका भुगतान किसे किया गया?
- विकास रोड लाइंस का कितना भुगतान अभी भी लंबित है?
- वैकल्पिक व्यवस्था लागू करने से पहले क्या निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई गई?
- सुरक्षा राशि जमा होने और अनुबंध प्रभावी रहने के बावजूद अनुबंध की अनदेखी क्यों की गई?
- क्या किसी विशेष परिवहनकर्ता को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया?
इन सवालों के जवाब अभी तक विभाग की ओर से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।
नियमों की अनदेखी या किसी को लाभ पहुंचाने का प्रयास?
शिकायतकर्ता ने आशंका व्यक्त की है कि विभागीय निर्णयों में पारदर्शिता नहीं बरती गई। उनका कहना है कि यदि अनुबंध अभी भी प्रभावी है और उनके विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई या अनुबंध समाप्ति का आदेश जारी नहीं हुआ, तो उन्हें कार्य से अलग करना अनुबंध की भावना और स्थापित प्रक्रिया के विपरीत प्रतीत होता है। शिकायत में मांग की गई है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, विभागीय रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं, लंबित भुगतान तत्काल जारी किया जाए तथा यदि अनुबंध प्रभावी है तो नियमानुसार परिवहन कार्य पुनः सौंपा जाए।
विभाग की चुप्पी से बढ़े सवाल
पूरा मामला अब केवल एक परिवहन कंपनी और विभाग के बीच का विवाद नहीं रह गया है। यह सरकारी निविदा प्रक्रिया, अनुबंधों की विश्वसनीयता, भुगतान प्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं तो यह सरकारी अनुबंध व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है, वहीं यदि विभाग ने सभी नियमों का पालन किया है तो उसे भी स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि किस आदेश, किस सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और किन परिस्थितियों में अनुबंधित परिवहनकर्ता को हटाकर दूसरे परिवहनकर्ता को कार्य सौंपा गया। फिलहाल पूरे मामले में सभी की निगाहें मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन के जिम्मेदार अधिकारियों के जवाब पर टिकी हैं। विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह मामला प्रशासनिक आवश्यकता का था या फिर शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों में कितना दम है।