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| क्या जनता का भरोसा टूट रहा है? कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी से बढ़ी उम्मीदें अब सवालों के घेरे में |
रीवा - जिले में जब जिला कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने पदभार ग्रहण किया था, तब आम जनता, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों के बीच एक नई उम्मीद जगी थी। उनकी सक्रिय कार्यशैली, जनसुनवाई में तत्परता और प्रशासनिक सख्ती को देखकर लोगों को विश्वास हुआ था कि अब जिले में वर्षों से जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार, लापरवाही और जनसमस्याओं पर निर्णायक कार्रवाई होगी। लेकिन समय के साथ जनता के मन में कई ऐसे प्रश्न जन्म लेने लगे हैं, जिनके उत्तर प्रशासन को देने होंगे।
आज यह चर्चा आम हो चली है कि क्या प्रारंभिक कार्रवाई और प्रशासनिक सक्रियता केवल दिखावे तक सीमित रह गई है, या फिर पर्दे के पीछे कोई दूसरा खेल भी चल रहा है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनता स्वयं को नेता, अधिकारी और सत्ता प्रतिष्ठानों से पहले ही ठगा हुआ महसूस कर रही है। ऐसे में यदि प्रशासन से भी उम्मीदें टूटती हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
राजस्व विभाग पर सबसे अधिक सवाल
रीवा जिले में राजस्व विभाग हमेशा से शिकायतों और भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में रहा है। वर्षों से शहर में जमे हुए कई पटवारियों और राजस्व कर्मचारियों के तबादले की बातें सामने आती हैं, लेकिन सवाल यह है कि यदि उनके तबादले हुए तो मात्र 24 घंटे के भीतर उन्हें निरस्त क्यों कर दिया गया? जनता यह भी पूछ रही है कि जिन कर्मचारियों के खिलाफ सबसे अधिक शिकायतें और भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उन्हें महत्वपूर्ण और अधिक राजस्व वाले हल्के कैसे प्राप्त हो गए? यदि प्रशासन भ्रष्टाचार के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की नीति पर कार्य कर रहा है, तो ऐसे मामलों में पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई देती?
शिक्षा व्यवस्था की बदहाल तस्वीर
शिक्षा विभाग की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। अनेक निजी विद्यालयों में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। वहीं स्कूली बच्चों के परिवहन में सुरक्षा मानकों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। छोटे-छोटे वाहनों में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाकर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।क्या जिला प्रशासन ने कभी जिले के निजी विद्यालयों और उनके परिवहन साधनों का व्यापक और नियमित निरीक्षण कराया है? यदि कराया है, तो उसके परिणाम क्या हैं?
तहसीलों में बढ़ते प्रकरण और गायब होती फाइलें
जिले की तहसीलों में वर्षों पुराने प्रकरण लंबित पड़े हैं। कंप्यूटरीकृत खसरे में त्रुटियों के सुधार के लिए नागरिक वर्षों से चक्कर काट रहे हैं। अनेक मामलों में फाइलें गुम होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। ऐसे में आम नागरिक को न्याय और प्रशासनिक सुविधा आखिर कब मिलेगी?
पंचायतों में विकास या केवल कागजों पर खर्च?
पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों को शहरों की तरह प्रकाश व्यवस्था उपलब्ध कराने की योजनाएं बनाई गईं। करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे भी किए गए, लेकिन अनेक गांव आज भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। सवाल यह है कि यदि योजनाओं का लाभ जनता तक नहीं पहुंचा, तो खर्च हुए धन का वास्तविक उपयोग कहां हुआ?
राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा
राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-30 और 135 की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। खराब सड़कें आए दिन दुर्घटनाओं का कारण बन रही हैं। अनेक परिवार सड़क दुर्घटनाओं में अपने प्रियजनों को खो चुके हैं। वर्षों से सड़क निर्माण और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
खनिज संपदा और जल संरक्षण का विरोधाभास
रीवा जिला खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र माना जाता है। दूसरी ओर शासन के अभिलेखों में जल संरक्षण के लिए अनेक योजनाओं के संचालन का दावा किया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई क्षेत्रों में न तो स्थायी जल संरक्षण संरचनाएं दिखाई देती हैं और न ही जल संग्रहण की पर्याप्त व्यवस्था। अवैध उत्खनन के कारण अनेक जल स्रोत प्रभावित हुए हैं। यदि करोड़ों रुपये जल संरक्षण पर खर्च किए गए हैं, तो उनके परिणाम कहां दिखाई देते हैं?
स्वास्थ्य विभाग और अवैध चिकित्सा का जाल
शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। अनेक स्थानों पर कथित रूप से अवैध चिकित्सकों के भरोसे स्वास्थ्य सेवाएं संचालित हो रही हैं। सरकारी अस्पतालों की सीमित सुविधाओं के कारण निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों पर जनता की निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। यदि प्रशासन स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर है, तो जिले में अवैध चिकित्सा पर व्यापक और निरंतर कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?
सहकारिता विभाग में पारदर्शिता का अभाव
सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक शिकायतें सामने आती रही हैं। उपभोक्ताओं के अंगूठे लग जाने के बावजूद खाद्यान्न वितरण नहीं होने के आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कभी उचित मूल्य दुकानों के स्टॉक और वितरण मशीनों के आंकड़ों का स्वतंत्र एवं व्यापक सत्यापन कराया जाता है?
जनता का विश्वास अभी भी कायम है
यह कहना गलत नहीं होगा कि रीवा जिले की जनता ने जिला कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी पर उतना विश्वास व्यक्त किया, जितना कई बार राजनीतिक नेतृत्व पर भी नहीं किया जाता। जनता को यह भरोसा था कि एक ईमानदार और संवेदनशील प्रशासनिक अधिकारी जिले की तस्वीर बदल सकता है। लेकिन आज वही जनता पूछ रही है कि क्या भ्रष्टाचार वास्तव में समाप्त हो रहा है या केवल उसका स्वरूप बदल गया है? क्यों भ्रष्टाचारियों का मनोबल कम होने के बजाय बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है? क्यों जनसमस्याएं वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं? जनता का प्रशासन से केवल एक ही आग्रह है—कार्रवाई दिखनी ही नहीं, बल्कि उसका परिणाम भी दिखाई देना चाहिए। यदि प्रशासनिक सख्ती केवल कागजों और सुर्खियों तक सीमित रही, तो जनता की उम्मीदें निराशा में बदलने में देर नहीं लगेगी।
सबसे बड़ा प्रश्न
क्या रीवा में वास्तविक प्रशासनिक परिवर्तन हो रहा है, या फिर इतिहास स्वयं को दोहराने की तैयारी में है? क्या पर्दे के पीछे कोई ऐसा तंत्र सक्रिय है जो भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं को संरक्षण दे रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर प्रशासनिक पारदर्शिता और प्रभावी कार्रवाई ही दे सकती है। रीवा की जनता आज भी आशान्वित है। वह केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव देखना चाहती है। क्योंकि जनता का विश्वास किसी भी प्रशासन की सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बनाए रखना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
