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भारतीय जनता पार्टी, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन बताती है, कभी अपनी विचारधारा, समर्पित कार्यकर्ताओं और राष्ट्रवादी मूल्यों के कारण पहचान रखती थी। "त्याग, तपस्या और बलिदान" की राजनीति करने वाले कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन को बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जनसंघ के अनेक कार्यकर्ताओं के संघर्ष की बदौलत पार्टी ने देश की सत्ता तक का सफर तय किया। "जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा" जैसे नारों के साथ आगे बढ़ने वाली भाजपा में आज अनेक ऐसे चेहरे दिखाई दे रहे हैं, जो कभी पार्टी की विचारधारा के कट्टर विरोधी रहे हैं। राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, वामपंथी दलों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों से आए नेता आज भाजपा में महत्वपूर्ण पदों और सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
रीवा संभाग की राजनीति पर यदि दृष्टि डाली जाए तो अनेक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व आज भाजपा के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने कभी भाजपा की नीतियों और विचारधारा का खुलकर विरोध किया था। कुछ नेताओं ने हिंदुत्व के मुद्दों पर भाजपा का विरोध किया, तो कुछ ऐसे राजनीतिक परिवारों से आते हैं, जिनका राजनीतिक इतिहास भाजपा की विचारधारा से पूरी तरह भिन्न रहा है। आज वही नेता सत्ता और संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर, वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाकर संघर्ष करने वाले अनेक पुराने कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। संगठन के लिए जेल जाने वाले, आंदोलनों में भाग लेने वाले और आर्थिक तथा सामाजिक कठिनाइयों के बावजूद पार्टी के लिए कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को अपेक्षित सम्मान और राजनीतिक अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दल बदलकर आने वाले नेताओं को सत्ता और संगठन में प्राथमिकता मिलने से मूल कार्यकर्ताओं में निराशा का वातावरण बनना स्वाभाविक है। जिस प्रकार किसी परिवार में घर की मालकिन अपने पुत्र को विशेष महत्व देती है, उसी प्रकार राजनीतिक दलों में भी समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन वर्तमान राजनीति में परिस्थितियां इसके विपरीत दिखाई देती हैं। भाजपा पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वह धीरे-धीरे उसी राजनीतिक संस्कृति को अपनाती जा रही है, जिसका वह कभी विरोध करती थी। गुटबाजी, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की रणनीतियां और अवसरवादी राजनीति आज संगठन के भीतर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यह स्थिति केवल जिला या संभाग स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश स्तर की राजनीति में भी इसके प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।
कांग्रेस की राजनीति पर लंबे समय तक परिवारवाद, गुटबाजी और अवसरवाद के आरोप लगते रहे हैं। अब आलोचकों का कहना है कि वही राजनीतिक संस्कृति भाजपा में भी प्रवेश करती दिखाई दे रही है। सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक निष्ठाएं बदलने का सिलसिला भारतीय राजनीति की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन विचारधारा आधारित राजनीति करने वाले दलों के लिए यह एक गंभीर प्रश्न बनकर सामने आया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि अनेक नेता अपनी राजनीतिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सत्ताधारी दल का रुख करते हैं। यदि भविष्य में सत्ता परिवर्तन होता है तो वही नेता किसी अन्य दल का दामन थामते हुए भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति अब केवल सत्ता और स्वार्थ तक सीमित होकर रह गई है?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या देश के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन को अपने समर्पित कार्यकर्ताओं और मूल विचारधारा को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए? क्या अवसरवाद की राजनीति संगठनात्मक मूल्यों पर भारी पड़ रही है? और क्या राजनीति में विचारधारा का स्थान अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित होकर रह गया है? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को निर्धारित करेंगे।
