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| "रीवा-मऊगंज की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल: शासकीय विद्यालयों की घटती संख्या और निजी स्कूलों का बढ़ता साम्राज्य" |
रीवा - रीवा एवं नवीन मऊगंज जिले में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंाजनक स्थिति सामने आ रही है। जिस शिक्षा को समाज और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना जाता है, आज वही शिक्षा ग्रामीण अंचलों में अनेक विसंगतियों और अव्यवस्थाओं का शिकार होती दिखाई दे रही है। शासकीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है, जबकि निजी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि शायद ही कोई ऐसी ग्राम पंचायत बची हो, जहां एक या दो निजी विद्यालय संचालित न हो रहे हों।शिक्षा किसी भी राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की नींव होती है। लेकिन विद्यालय में 12 वी तक तो मान्यता प्राप्त है लेकिन अधिकांश स्कूलों में न तो योग्य शिक्षक है और न ही प्रयोगशाला सहायक है और न ही भृत्य है और न ही शिक्षकों के खाते में वेतन डाला जाता है और कम वेतन पर शिक्षकों का शोषण करते हैं यदि समय पर शिक्षकों को वेतन नहीं मिला तो वो बच्चो को शिक्षा क्या देंगे यदि बच्चों में यह नींव कमजोर होगी तो भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र की विकास यात्रा भी प्रभावित होगी। किंतु रीवा और मऊगंज जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार
ग्रामीण क्षेत्रों में खुले अधिकांश निजी विद्यालय आकर्षक भवनों, रंगीन यूनिफॉर्म, आधुनिक नामों और शहरों जैसी सुविधाओं का प्रचार कर अभिभावकों को आकर्षित कर रहे हैं। कई विद्यालय मनमाने ढंग से महंगी किताबें, यूनिफॉर्म और परिवहन शुल्क वसूल रहे हैं। बच्चों को एक छोटे वाहन में क्षमता से अधिक संख्या में बैठाकर विद्यालय लाया-ले जाया जा रहा है, जो परिवहन नियमों का भी खुला उल्लंघन है। सबसे गंभीर बात यह है कि अनेक निजी विद्यालयों में प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव है। कई स्थानों पर मात्र दो से तीन हजार रुपये मासिक वेतन पर शिक्षकों से छह से सात घंटे तक अध्यापन कराया जा रहा है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है?
मान्यता और गुणवत्ता पर सवाल
क्षेत्र में ऐसे कई विद्यालय भी संचालित होने की चर्चाएं हैं, जो प्राथमिक स्तर तक मान्यता प्राप्त होने के बावजूद कक्षा 9वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों का नामांकन लेकर उन्हें किसी अन्य संस्थान से परीक्षाएं दिलवा रहे हैं। यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर विषय है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों से छह हजार रुपये से लेकर पंद्रह हजार रुपये तक शुल्क लिए जाने के बावजूद कई विद्यालयों में प्रयोगशाला, खेलकूद की सुविधाएं, पुस्तकालय तथा योग्य शिक्षकों का अभाव देखा जा सकता है।
शासकीय विद्यालय क्यों हो रहे खाली?
प्रदेश सरकार द्वारा शासकीय विद्यालयों में निशुल्क पाठ्यपुस्तकें, मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्तियां और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद अभिभावक निजी विद्यालयों की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं? यह प्रश्न शिक्षा विभाग के लिए आत्ममंथन का विषय है। ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक अभिभावकों का मानना है कि शासकीय विद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। शिक्षकों की समयबद्ध उपस्थिति के बावजूद बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धियां संतोषजनक नहीं हैं। कई मामलों में कक्षा पांचवीं, छठवीं अथवा दसवीं के विद्यार्थी सामान्य हिंदी पाठ भी सुचारु रूप से पढ़ने और लिखने में कठिनाई महसूस करते हैं। यदि विद्यार्थियों की बुनियादी भाषा एवं गणितीय समझ कमजोर है तो इसके कारणों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। शिक्षा केवल उपस्थिति दर्ज कराने का माध्यम नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के बौद्धिक और नैतिक विकास का साधन है।
प्रशासनिक निगरानी पर भी उठ रहे सवाल
निजी विद्यालयों की मान्यता, भवन सुरक्षा, परिवहन व्यवस्था, शिक्षक योग्यता तथा विद्यार्थियों के लिए मूलभूत सुविधाओं की नियमित जांच की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की है। यदि कहीं क्षमता से अधिक बच्चों को वाहनों में बैठाया जा रहा है, कक्षाओं में पंखों और बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है या विद्यालय निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो संबंधित विभागों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
शिक्षा का बाजारीकरण चिंताजनक
आज शिक्षा सेवा से अधिक व्यवसाय का रूप लेती दिखाई दे रही है। निजी विद्यालयों में सुविधाओं के नाम पर भारी शुल्क वसूला जा रहा है, जबकि शासकीय विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों का अपेक्षित लाभ विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे हो रहे हैं।
आवश्यक है व्यापक सर्वे और सुधार
रीवा एवं मऊगंज जिले में शासकीय विद्यालयों में घटती छात्र संख्या, निजी विद्यालयों की बढ़ती संख्या, शिक्षकों की योग्यता, विद्यालयों की मान्यता और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर व्यापक सर्वेक्षण एवं निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और परिवहन विभाग को संयुक्त रूप से इस विषय पर ठोस कदम उठाने होंगे। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। समय की मांग है कि शिक्षा को व्यवसाय नहीं, राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाए।
