"युवा तरुणाई का आंदोलन और सत्ता से सवाल: रीवा संभाग की बदलती राजनीतिक चेतना"

"युवा तरुणाई का आंदोलन और सत्ता से सवाल: रीवा संभाग की बदलती राजनीतिक चेतना"

रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश के रीवा संभाग सहित नवीन मऊगंज जिले में वर्तमान समय में युवाओं के बीच उभर रहा जनआक्रोस निश्चित रूप से चिंतन और गंभीर विमर्श का विषय है। यह मान लेना कि देश और प्रदेश का प्रत्येक युवा किसी न किसी राजनीतिक दल, विचारधारा अथवा संगठन से जुड़ा हुआ है, वास्तविकता से परे होगा। समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो राजनीति से दूर रहकर अपने भविष्य, रोजगार, व्यवसाय और परिवार के भरण-पोषण में व्यस्त रहना पसंद करता है। यही वह वर्ग है जो न किसी नेता की चाटुकारिता करता है और न किसी अधिकारी की, बल्कि अपनी मेहनत और परिश्रम के बल पर जीवनयापन करता है।

यदि भ्रष्टाचार की बात की जाए तो यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल किसी एक राजनीतिक दल के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार हुआ है। देश और प्रदेश की विभिन्न सरकारों पर समय-समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी शिक्षा कर्मी घोटाले सामने आए, जिनमें कई मामलों में संबंधित व्यक्तियों को पद छोड़ना पड़ा और न्यायालयों में वर्षों तक मुकदमे चले। रीवा संभाग में शिक्षककर्मी भर्ती से जुड़े विवाद लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहे। विपक्ष ने उस समय सरकार को कठघरे में खड़ा किया था और सत्ता पक्ष से जुड़े कई लोगों को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। किन्तु वर्तमान सरकार  में व्यापम घोटाला हुआ था जीमे कई लोगो की जाने भी गयी थी किन्तु दोनों घोटालो में नियुक्ति करता दोषी पाए गए किन्तु किनका गलत चयन हुआ आज तक पता नहीं चला 

इसी प्रकार महिला एवं बाल विकास विभाग, सहकारी संस्थाओं और विभिन्न नियुक्तियों में अनियमितताओं के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं, जिन्हें पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि सत्ता में बैठी सरकार को जनता और विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देना होता है।

वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी प्रदेश और देश में मजबूत राजनीतिक स्थिति में है, लेकिन राजनीतिक घटनाओं और जनआंदोलनों पर प्रत्येक बार पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों का उदाहरण देकर वर्तमान परिस्थितियों को उचित ठहराने की प्रवृत्ति भी गंभीर बहस का विषय बनती जा रही है। यदि कांग्रेस के शासनकाल की नीतियां और कार्य जनता को पूर्णतः स्वीकार्य होते, तो वह लंबे समय तक सत्ता से बाहर नहीं रहती। उसी प्रकार यह भी लोकतांत्रिक सत्य है कि यदि वर्तमान सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो राजनीतिक परिस्थितियां भविष्य में बदलने में देर नहीं लगती। रीवा संभाग का इतिहास आंदोलनों और जनभागीदारी का रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समय-समय पर डंकल प्रस्ताव, रोजगार और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी यहां के युवाओं ने अपनी आवाज बुलंद की है।

हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में युवाओं द्वारा किए गए आंदोलनों और उन पर हुई कार्रवाई ने अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। यदि किसी आंदोलन में असामाजिक तत्व शामिल होकर हिंसा करते हैं, तो कानून के अनुसार उनके विरुद्ध कार्रवाई होना आवश्यक है। वहीं, यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं या छात्र-छात्राओं के साथ अत्यधिक बल प्रयोग किया जाता है, तो उसकी भी लोकतांत्रिक और मानवीय दृष्टिकोण से समीक्षा होना आवश्यक है। भारत की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली सेनाओं एवं सुरक्षा बलों की भूमिका सदैव सम्माननीय रही है। आतंकवाद, उग्रवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के विरुद्ध उन्होंने अतुलनीय योगदान दिया है। ऐसे में यह भी अपेक्षा की जाती है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों और जनभावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, जिससे जनता और सुरक्षा बलों के बीच विश्वास बना रहे।

रीवा संभाग में गांव-गांव और घर-घर राजनीतिक चर्चाओं का दौर जारी है। यह वही क्षेत्र है जिसने वर्षों से भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा चुनावों में उल्लेखनीय जनसमर्थन प्रदान किया है। जनता आज भी उन चर्चित मामलों को याद करती है, जिनमें विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में घोटालों और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों को लेकर सवाल उठे थे। लोकतंत्र में जनता की स्मृति लंबी होती है और वह समय आने पर अपना निर्णय स्वयं देती है। राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे के भ्रष्टाचार और विफलताओं की सूची जारी करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इसके साथ ही आत्ममंथन भी उतना ही आवश्यक है। जनता यह जानना चाहती है कि सत्ता में रहते हुए किन वादों को पूरा किया गया और किन मुद्दों पर अभी भी काम किया जाना बाकी है।

आज का युवा केवल नारों से संतुष्ट नहीं है। वह रोजगार, पारदर्शिता, न्याय और सम्मानजनक भविष्य की अपेक्षा करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता है और सत्ता का वास्तविक आधार भी वही है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह समझना आवश्यक है कि जनभावनाओं की उपेक्षा लंबे समय तक संभव नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता का निर्णय सदैव सर्वोपरि रहता है।

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