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| रीवा; मप्र सरकार की ट्रांसफर नीति को बिचौलियों का 'दीमक': रीवा में 'सेवा शुल्क' और 'नजराने' के खेल से सुशासन पर लग रहा दाग |
रीवा - मध्य प्रदेश सरकार ने शासकीय कर्मचारियों की सुविधा और प्रशासनिक कसावट के लिए एक पारदर्शी स्थानांतरण नीति (ट्रांसफर पॉलिसी) लागू की है। इसके तहत प्रशासनिक आवश्यकता, कर्मचारियों की सुविधा और अपराध नियंत्रण को ध्यान में रखकर 5 से 10 वर्ष तक एक ही स्थान पर जमे अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले का प्रावधान है। प्रदेश के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी निष्ठापूर्वक इस नीति का पालन कराने का प्रयास भी कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। वर्तमान में रीवा जिले सहित पूरे संभाग में ट्रांसफर के नाम पर बिचौलियों और तथाकथित रसूखदारों का एक बड़ा सिंडिकेट सक्रिय हो चुका है, जो सरकार की साख को बट्टा लगा रहा है।
मलाईदार थानों और विभागों के लिए तय 'रेट कार्ड'!
जन-चर्चाओं और विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, शिक्षा, स्वास्थ्य, खनिज, परिवहन और विशेषकर पुलिस विभाग में मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए 'नजराना' और 'सेवा शुल्क' का खुला खेल चल रहा है। रीवा जिले में, जहां कमाई के अवैध साधन और मलाईदार क्षेत्र अधिक हैं, वहां जाने के लिए बकायदा स्थलों के हिसाब से रेट तय होने की चर्चाएं आम हैं। राजनैतिक गलियारों में यह बात तैर रही है कि इन मनचाहे तबादलों के लिए न्यूनतम डेढ़ लाख रुपये से लेकर करोड़ों रुपये तक की बोलियां लग रही हैं।
राजनेताओं और अधिकारियों के तथाकथित करीबियों का सिंडिकेट
इस पूरे खेल के पीछे नेताओं के तथाकथित करीबी, कुछ जमे हुए कर्मचारी और अधिकारियों के इर्द-गिर्द घूमने वाले कुछ रसूखदार लोग सक्रिय हैं। ये बिचौलिए ट्रांसफर के इच्छुक कर्मचारियों से मिलकर अपनी 'सेवा भावना' (स्वार्थ) सिद्ध कर रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे इस खेल से न केवल ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल टूट रहा है, बल्कि सुशासन का दावा करने वाली सरकार की छवि भी धूमिल हो रही है।
राष्ट्रीय राजमार्ग बनाम ग्रामीण अंचल: नशीली सिरप और अपराध का गठजोड़
रीवा जिले में नशीली कफ सायरप और अवैध शराब का कारोबार राष्ट्रीय राजमार्गों (नेशनल हाईवे) और ग्रामीण अंचलों में तेजी से पैर पसार चुका है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित थानों की मानी जा रही है।
प्रशासन को बड़ा सुझाव: जनहित में यह अत्यंत आवश्यक है कि जो पुलिस कर्मचारी राष्ट्रीय राजमार्ग के थानों में लंबे समय से जमे हैं, उन्हें तत्काल ग्रामीण अंचलों में भेजा जाए और ग्रामीण क्षेत्रों के स्टाफ को हाईवे पर तैनात किया जाए। संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को शासन के क्राइटेरिया (5 या 10 वर्ष) के अनुसार अपने अधीनस्थों से पूरी सूची मंगवानी चाहिए।
अधिकारियों से ज्यादा नेताओं के वफादार हैं 'अधीनस्थ'
रीवा संभाग की एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि यहां के कई अधीनस्थ कर्मचारी अपने प्रशासनिक अधिकारियों से ज्यादा स्थानीय राजनेताओं के प्रति वफादारी निभाते हैं। पूर्व में देखा गया है कि रीवा जिला कलेक्टर की जनहितैषी कार्ययोजनाओं के खिलाफ यही अधीनस्थ कर्मचारी मुखर होकर विरोध में उतर आए थे।
सक्रिय कमिश्नर-कलेक्टर के दफ्तरों में जमे 'दीमक'
वर्तमान समय में रीवा जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त (कमिशनर) बेहद सक्रियता और ईमानदारी से काम कर रहे हैं। जनता के बीच उनकी छवि एक कड़क और साफ-सुथरे अधिकारी की है। किंतु विडंबना यह है कि उनके अपने ही कार्यालयों में 'दीमक' रूपी कुछ पुराने कर्मचारी जमे हुए हैं। ये कर्मचारी न सिर्फ सौदेबाजी और 'सेवा शुल्क' निर्धारित कर रहे हैं, बल्कि दफ्तरों की बेहद गोपनीय प्रशासनिक जानकारियां और फाइलें बिचौलियों तथा नेताओं तक पहुंचा रहे हैं।
