रीवा; विंध्य भाजपा में 'आयातित' नेताओं का वर्चस्व: उपेक्षा के शिकार मूल कार्यकर्ता, विकास कार्यों में 'सेवा शुल्क' की चर्चाएं तेज

रीवा; विंध्य भाजपा में 'आयातित' नेताओं का वर्चस्व: उपेक्षा के शिकार मूल कार्यकर्ता, विकास कार्यों में 'सेवा शुल्क' की चर्चाएं तेज

रीवा - विंध्य की राजनीति और विशेषकर रीवा संभाग में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर अंदरूनी असंतोष और वैचारिक संकट गहराता जा रहा है। क्षेत्र में कभी "अटल-आडवाणी, कमल निशान-मांग रहा है हिंदुस्तान" का नारा बुलंद करने वाले जमीनी और मूल कार्यकर्ता आज खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। राजनैतिक हलकों और जन-चर्चाओं में यह बात प्रमुखता से उठ रही है कि संगठन को अपने खून-पसीने से सींचने वाले पुराने परिवारों की विरासत को दरकिनार कर, अन्य दलों से आए 'आयातित' नेताओं को कमान सौंप दी गई है।

तीन-तीन राजनीतिक परिवारों की विरासत पर संकट

स्थानीय स्तर पर हो रही चर्चाओं के अनुसार, रीवा लोकसभा समेत मनगँवा, मऊगंज और रीवा विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को स्थापित करने वाले तीन प्रमुख राजनीतिक परिवारों की विरासत आज सिमटती नजर आ रही है। आरोप है कि विंध्य की धरा पर अब उन नेताओं का बोलबाला और वर्चस्व स्थापित हो चुका है, जो मूल रूप से दूसरी विचारधाराओं से आए हैं। इस 'आयातित संस्कृति' के कारण उन मूल कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है, जिन्होंने कभी कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कम्युनिस्ट पार्टी का पुरजोर विरोध किया था।

विकास या विनाश? निर्माण कार्यों में 'सेवा शुल्क' का खेल

क्षेत्र में विकास के दावों के बीच भ्रष्टाचार और 'सेवा शुल्क' (कमीशन) की अफवाहों ने जोर पकड़ लिया है। सूत्रों और जन-चर्चाओं के मुताबिक, विभिन्न निर्माण कार्यों और पंचायतों को दी जाने वाली राशि में कथित तौर पर 20 से 50 प्रतिशत तक का हिस्सा अलग-अलग स्तरों पर 'सेवा शुल्क' के रूप में चला जाता है।

बड़ा सवाल: यदि विकास कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह खर्च हो रहा है, तो केवल बचे हुए प्रतिशत में होने वाले कार्यों की गुणवत्ता क्या होगी? स्थानीय स्तर पर लोग भय और सत्ता के दबाव के कारण खुलकर बोलने से कतराते हैं, लेकिन बंद कमरों और गोपनीय मुलाकातों में यह पीड़ा लगातार सामने आ रही है।

प्रताड़ना और उपेक्षा का शिकार होते मूल कार्यकर्ता

सबसे गंभीर स्थिति उन समर्पित कार्यकर्ताओं की है जो आज गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं या बिस्तर पर हैं। जिन्होंने जीवनभर पार्टी के लिए तपस्या और बलिदान दिया, आज उनके पास बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। जब ये कार्यकर्ता अपने छोटे-छोटे काम लेकर वर्तमान जनप्रतिनिधियों के पास जाते हैं, तो उन्हें उपेक्षा और आंतरिक विरोध का सामना करना पड़ता है। इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान में सत्तासीन कई नेता अतीत में इन्हीं कार्यकर्ताओं के राजनीतिक विरोधी रहे हैं।

संगठन में घुसपैठ और बढ़ता जन-आक्रोश

समाचार माध्यमों को मिल रही जानकारियों के अनुसार, संगठन के भीतर भी ऐसे तत्वों का प्रवेश हो चुका है जो कथित तौर पर भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। हालांकि, विधानसभा चुनावों में भाजपा को भारी मत मिले, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत पार्टी के नाम पर हुई थी। वर्तमान जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली से उनका व्यक्तिगत नुकसान भले न हो रहा हो, लेकिन जमीन पर भाजपा के प्रति आम जनता और कार्यकर्ताओं का आक्रोश निरंतर बढ़ रहा है।

क्या विपक्ष से बेहतर साबित हो सकता है अपनों का विरोध?

रीवा और विंध्य के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि यदि भाजपा के पुराने और संघर्षशील कार्यकर्ता आज भी विरोध में उतर आएं, तो वे वर्तमान विपक्ष (कांग्रेस) से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सकते हैं, क्योंकि उनमें संघर्ष करने की क्षमता और अनुभव अधिक है। एक दौर था जब राष्ट्रीय, प्रादेशिक और जिला स्तर का नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं के सुख-दुख का ध्यान रखता था, लेकिन आज 'साम, दाम, दंड, भेद' से केवल सत्ता तक पहुंचना ही मुख्य लक्ष्य प्रतीत हो रहा है। यदि केंद्रीय और प्रादेशिक संगठन ने समय रहते विंध्य के इस जमीनी असंतोष और कार्यकर्ताओं की पीड़ा को नहीं सुना, तो आने वाले समय में वैचारिक निष्ठा के दाग-धब्बे ही रह जाएंगे और मूल संगठन को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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