![]() |
| ग्वालियर; कर्ज दो या कुर्सी छोड़ो! सहकारी बैंकों पर सरकार का सख्त संदेश Aajtak24 News |
ग्वालियर - ग्वालियर में आयोजित सहकारी बैंकों की समीक्षा बैठक में किसानों को समय पर ऋण उपलब्ध कराने और सहकारी संस्थाओं को ज्यादा जवाबदेह बनाने पर जोर दिया गया। अपैक्स बैंक के प्रशासक महेंद्र सिंह यादव ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि सहकारी बैंक सिर्फ कागजी संस्थाएं बनकर न रहें, बल्कि किसानों के हित में सक्रिय रूप से काम करें। जिला पंचायत सभागार में आयोजित बैठक में ग्वालियर और चंबल संभाग के सभी जिलों के सहकारी बैंकों के अधिकारी शामिल हुए। बैठक में कहा गया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव की मंशा के अनुरूप पात्र किसानों तक समय पर ऋण और योजनाओं का लाभ पहुंचाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
बैठक में सदस्यता महा अभियान की प्रगति, वर्ष 2025-26 में दिए गए अल्पावधि फसल ऋण की वसूली और खरीफ 2026 के लिए ऋण वितरण की तैयारी की समीक्षा की गई। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि किसानों से लगातार संवाद बनाए रखें और ऋण वसूली में तेजी लाकर बैंकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करें। अपैक्स बैंक प्रशासन ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई क्षेत्रों में सहकारी संस्थाएं अपेक्षित स्तर पर सक्रिय नहीं हैं। इसी वजह से पैक्स के माध्यम से संचालित बहुउद्देशीय गतिविधियों, टर्म लोन वितरण और समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी की स्थिति का भी विस्तृत मूल्यांकन किया गया।
बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि सहकारी संस्थाओं की मजबूती सीधे तौर पर किसानों की आर्थिक स्थिति से जुड़ी हुई है। यदि समय पर ऋण वितरण और वसूली की प्रक्रिया संतुलित नहीं रही तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इस दौरान अपैक्स बैंक भोपाल से वरिष्ठ अधिकारी राजकुमार गंगेले और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ग्वालियर के सीईओ हिमांशु खाड़े सहित संभाग के सभी जिलों के अधिकारी मौजूद रहे।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- यदि सहकारी बैंक पहले से किसान हितैषी तरीके से काम कर रहे थे, तो फिर अधिकारियों को “अधिक सक्रिय और जवाबदेह” बनने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या सरकार खुद व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है?
- फसल ऋण वसूली बढ़ाने का दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन क्या सरकार यह बताएगी कि कितने किसानों को समय पर ऋण ही नहीं मिला या वे प्रक्रिया की जटिलताओं के कारण बाहर रह गए?
- पैक्स और सहकारी बैंकों को मजबूत बनाने की बातें वर्षों से हो रही हैं, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आज भी निजी साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर पैसा लेने को मजबूर क्यों हैं?
