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| छिंदवाड़ा; अचानक पहुंचे अफसर, खुली पशु चिकित्सा केंद्रों की हकीकत! कहीं कर्मचारी गायब Aajtak24 News |
छिंदवाड़ा - जिले के तामिया क्षेत्र में पशुपालन एवं डेयरी विभाग की व्यवस्थाओं की हकीकत उस समय सामने आई जब उप संचालक डॉ. एच.जी.एस. पक्षवार ने विभिन्न पशु चिकित्सा संस्थानों और गौशाला का अचानक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कहीं विभागीय लक्ष्यों को लेकर निर्देश दिए गए, तो कहीं कर्मचारियों की अनुपस्थिति भी सामने आई।
सबसे पहले तामिया पशु चिकित्सालय का निरीक्षण किया गया, जहां डॉ. नागले, डॉ. प्रियंका और चौकीदार सुरेश उपस्थित मिले। यहां अभिलेखों की जांच करते हुए अधिकारियों को विभागीय लक्ष्य समय पर पूरे करने के निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री वृंदावन ग्राम योजना और क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत ग्राम लहगड़ुआ में किए गए सर्वे कार्य का भी निरीक्षण किया गया।
निरीक्षण के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के अंतर्गत दोनों पशु चिकित्सकों को दो-दो प्रकरण स्वीकृत और वितरित कराने का लक्ष्य दिया गया। इसके बाद पशु औषधालय देलाखारी का निरीक्षण किया गया, जहां संस्था प्रभारी एस.पी. परतेती उपस्थित पाए गए, लेकिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी विनीता अनुपस्थित मिलीं। इस पर विभागीय रिकॉर्ड की जांच कर आवश्यक निर्देश दिए गए।
निरीक्षण के क्रम में नंदनी गौशाला खापाखुर्द का भी जायजा लिया गया। यहां गौशाला की व्यवस्थाएं संतोषजनक पाई गईं। समूह की सचिव तुलसा परतेती ने अधिकारियों को गौशाला की गतिविधियों की जानकारी दी। निरीक्षण में 125 गौवंश मौजूद पाए गए और पशुओं के लिए पानी, चारा तथा अन्य संसाधनों की पर्याप्त व्यवस्था मिली।
गौशाला में नेपियर घास, मूंग और उड़द की खेती के साथ-साथ कंडे निर्माण और दुग्ध उत्पादन का कार्य भी किया जा रहा है। अधिकारियों को बताया गया कि दूध से घी तैयार कर उसकी बिक्री की जा रही है, जबकि गेहूं और अन्य फसलों से भी आय अर्जित की जा रही है। विभाग का कहना है कि गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। निरीक्षण के दौरान उप संचालक के साथ अन्य विभागीय अधिकारी भी मौजूद रहे।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- यदि आकस्मिक निरीक्षण में कर्मचारी अनुपस्थित मिले, तो क्या विभाग नियमित मॉनिटरिंग में लापरवाही स्वीकार करता है? ऐसे मामलों में अब तक कितनी कार्रवाई हुई?
- गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन क्या विभाग यह बताएगा कि जिले की कितनी गौशालाएं वास्तव में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और कितनी सिर्फ सरकारी अनुदान पर निर्भर हैं?
- पशु चिकित्सा संस्थानों को विभागीय लक्ष्य दिए जा रहे हैं, लेकिन क्या ग्रामीण क्षेत्रों में पशु डॉक्टरों और दवाओं की उपलब्धता वास्तव में पर्याप्त है या किसानों को अब भी निजी इलाज का सहारा लेना पड़ता है?
