जमीन जहर उगलने लगी तो जागा कृषि विभाग! अब किसानों को सिखाई जा रही ‘कम खाद, ज्यादा उपज’ की खेती Aajtak24 News

जमीन जहर उगलने लगी तो जागा कृषि विभाग! अब किसानों को सिखाई जा रही ‘कम खाद, ज्यादा उपज’ की खेती Aajtak24 News

ग्वालियर - जिले में लगातार घटती मृदा गुणवत्ता और रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग के बीच अब कृषि वैज्ञानिकों और प्रशासन ने किसानों को टिकाऊ खेती की राह दिखाने की पहल तेज कर दी है। “किसान कल्याण वर्ष 2026” के अंतर्गत जिले के डबरा विकासखंड के ग्राम बिलौआ में किसानों को मृदा परीक्षण आधारित खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए जागरूक किया गया। कार्यक्रम में किसानों को यह समझाया गया कि यदि समय रहते मिट्टी की सेहत नहीं सुधारी गई तो आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से संबद्ध केंद्रीय आलू अनुसंधान क्षेत्रीय केंद्र ग्वालियर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को मिट्टी की जांच के महत्व, रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव और प्राकृतिक खेती के विकल्पों पर विस्तार से जानकारी दी। गांव में जागरूकता रैली निकालकर भी किसानों को संदेश दिया गया कि केवल अधिक खाद डालने से उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लगातार कमजोर होती जाती है।

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सुभाष कटारे ने कहा कि किसान यदि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करें तो खेती की लागत कम होने के साथ-साथ उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है। उन्होंने फसल चक्र, हरी खाद और संतुलित पोषण प्रबंधन को टिकाऊ खेती की सबसे बड़ी जरूरत बताया। वैज्ञानिकों का कहना था कि कई किसान बिना जांच के खेतों में डीएपी और यूरिया का अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो रही है। मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. संजय कुमार शर्मा ने किसानों को मिट्टी का सही नमूना लेने की विधि समझाई। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी की जांच कर यह पता लगाया जा सकता है कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी है और किस उर्वरक की वास्तव में जरूरत है। उन्होंने आलू, टमाटर और बैंगन जैसी फसलों में लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय भी बताए।

कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने हरी खाद के महत्व पर विशेष जोर दिया। डॉ. एस.के. गुप्ता ने कहा कि ढैंचा और सनई जैसी फसलें मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में बेहद कारगर हैं। इनके उपयोग से खेतों में जैविक तत्व बढ़ते हैं और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे मिट्टी को केवल उत्पादन का साधन न मानें, बल्कि उसकी सेहत को भी प्राथमिकता दें। प्राकृतिक खेती को लेकर भी किसानों में उत्सुकता दिखाई दी। आत्मा परियोजना से जुड़े बीटीएम मलखान सिंह गहलोत ने किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत, नीमास्त्र, बीजामृत और दशपर्णी अर्क जैसे जैविक घोल तैयार करने की विधियां बताईं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल लागत घटाती है बल्कि इससे मिट्टी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहते हैं।

कार्यक्रम में शामिल किसानों ने भी खेती के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता जताई। उत्कृष्ट कृषक प्राण सिंह माथुर ने किसानों की ओर से यह संकल्प लिया कि अब बिना जरूरत डीएपी और यूरिया का अत्यधिक उपयोग नहीं किया जाएगा और संतुलित उर्वरकों का प्रयोग किया जाएगा। कार्यक्रम में कुल 61 किसान शामिल हुए, जिनमें 4 महिला किसान भी थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के जागरूकता अभियान लगातार गांव-गांव तक पहुंचते रहे तो खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। हालांकि सवाल यह भी उठ रहे हैं कि वर्षों तक रासायनिक खादों को बढ़ावा देने के बाद अब किसानों को प्राकृतिक और संतुलित खेती की सीख क्यों दी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई किसान अभी भी मृदा परीक्षण की सुविधाओं और सही तकनीकी मार्गदर्शन से दूर हैं।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. जब वर्षों से रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती रही, तब कृषि विभाग ने पहले बड़े स्तर पर रोकथाम और जागरूकता अभियान क्यों नहीं चलाया?
  2. मृदा परीक्षण आधारित खेती की बात की जा रही है, लेकिन जिले के कितने किसानों की वास्तव में नियमित मृदा जांच हो पा रही है और कितने गांवों तक यह सुविधा अभी भी नहीं पहुंची है?
  3. प्राकृतिक खेती और जैव उर्वरकों को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तो क्या सरकार रासायनिक खादों पर निर्भर किसानों को आर्थिक सहायता या अलग प्रोत्साहन नीति देने जा रही है, या यह केवल जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहेगा?

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