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| रीवा-मऊगंज में 'खाकी और खादी' का गठजोड़: कलेक्टर के प्रतिबंध को ठेंगे पर रख पाताल चीर रही अवैध बोरिंग मशीनें Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की धरा इस समय भीषण जल संकट के दौर से गुजर रही है। गिरते जलस्तर को बचाने के लिए रीवा और नवनियुक्त मऊगंज कलेक्टर ने नए नलकूप खनन (बोर) पर कड़ा प्रतिबंध लगाया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जहाँ पानी बचाने की जिम्मेदारी थी, वहीं 'खाकी और खादी' के संरक्षण में भ्रष्टाचार की 'मैली गंगा' बह रही है। आदेश केवल फाइलों में चमक रहे हैं, जबकि धरातल पर अवैध बोरिंग का काला खेल धड़ल्ले से जारी है।
लाल गांव का 'पचरा कांड': कार्रवाई या महज दिखावा? प्रशासनिक मिलीभगत का ताजा और ज्वलंत उदाहरण लाल गांव के समीप पचरा में देखने को मिला। सूत्रों के अनुसार, नायब तहसीलदार सिरमौर ने मुखबिर की सटीक सूचना पर छापामार कार्रवाई कर एक बोरिंग मशीन को रंगे हाथों पकड़ा था। मशीन को लाल गांव चौकी के पीछे खड़ा भी कराया गया, जिससे जनता में यह संदेश गया कि अब कानून का राज चलेगा। लेकिन यह उम्मीद चंद घंटों की ही निकली। सुबह होते ही 'सफेदपोश' नेताओं के दबाव और प्रशासनिक 'सेटिंग' के चलते बिना किसी ठोस कार्रवाई के मशीन को वहां से रवाना कर दिया गया। यह घटना सीधे तौर पर कलेक्टर के आदेशों की धज्जियां उड़ाने जैसी है।
प्रतिबंध के बाद बढ़ा 'सुविधा शुल्क' का ग्राफ एक बोर संचालक ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बड़ा खुलासा किया है। उसके अनुसार, कलेक्टर के प्रतिबंध के बाद काम बंद नहीं हुआ है, बल्कि 'जोखिम' के नाम पर वसूली का रेट बढ़ गया है। राजस्व विभाग के पटवारी, तहसीलदार से लेकर स्थानीय पुलिस तक का 'हिस्सा' पहले से तय होता है। प्रतिबंध से पहले जो काम सामान्य दरों पर होता था, अब उसी के लिए आम आदमी से मोटी रकम वसूली जा रही है। सरकार की मंशा जल संरक्षण की है, लेकिन मैदानी अमला इसे अपनी तिजोरियां भरने का सुनहरा अवसर मान रहा है।
सिस्टम के सामने खड़े तीखे सवाल इस पूरे प्रकरण ने रीवा और मऊगंज प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है:
रिकॉर्ड का अभाव: क्या प्रशासन के पास कोई ऐसा तंत्र है जो यह बता सके कि प्रतिबंध के बाद जिलों में कितने अवैध बोर बढ़े? क्या पटवारियों से इसकी जवाबदेही मांगी गई?
अघोषित संरक्षण: नायब तहसीलदार द्वारा पकड़ी गई मशीन को आखिर किसके दबाव में छोड़ा गया? क्या इसकी जानकारी जिला कलेक्टर या पुलिस अधीक्षक को थी?
भविष्य का संकट: क्या संभागीय आयुक्त और आईजी स्तर के अधिकारी इस 'सिंडिकेट' को तोड़ने की इच्छाशक्ति दिखाएंगे?
प्यासी रह जाएगी धरा यदि समय रहते इन अवैध गतिविधियों और भ्रष्टाचार के गठजोड़ पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो जल जीवन मिशन के दावे धरे के धरे रह जाएंगे। भविष्य में रीवा और मऊगंज की प्यासी जनता के गुनहगार वे अधिकारी और नेता होंगे, जिन्होंने चंद रुपयों के लालच में प्राकृतिक संसाधनों का सौदा कर लिया। आम जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या जल संकट का समाधान होगा या 'साहबों' की तिजोरी ही भरती रहेगी?
