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| मऊगंज-रीवा में कमीशन का 'रेट कार्ड' फिक्स: 50 पैसे से 2 रुपये के खेल में पिस रहा असली किसान Aajtak24 News |
मऊगंज - विंध्य क्षेत्र के रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में सरकारी खरीदी (धान, गेहूं, चना और मसूर) की प्रक्रिया इन दिनों किसानों के कल्याण के बजाय भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन गई है। कहावत है कि "हांडी का एक चावल ही काफी होता है," लेकिन यहाँ तो उपार्जन की पूरी हांडी ही भ्रष्टाचार की आंच में काली हो चुकी है।
कमीशन का संगठित नेटवर्क: ₹2 का गणित इस पूरे खेल में सहकारिता विभाग, नागरिक आपूर्ति निगम और राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से एक 'रेट कार्ड' तैयार किया गया है। सूत्रों के अनुसार, ₹2 प्रति क्विंटल से लेकर 50 पैसे तक का हिस्सा एक दर्जन से अधिक मेजों पर बंटता है। यह एक ऐसा संगठित माफिया नेटवर्क है, जिसने सिस्टम की जड़ों को खोखला कर दिया है। बिचौलिए और ट्रांसपोर्टर इस सिंडिकेट के मुख्य स्तंभ बने हुए हैं।
असली किसान बेहाल, 'कागजी' काश्तकार निहाल सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि पटवारियों से सांठगांठ कर कागजों पर फसल बुआई दर्शाने वाले 'तथाकथित किसान' ₹100 से ₹200 प्रति क्विंटल का अवैध लाभ कमा रहे हैं। वहीं, पसीना बहाकर फसल उगाने वाला असली और ईमानदार किसान अपनी उपज बेचने के लिए आज भी केंद्रों पर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। यह 'जुगाड़ तंत्र' छोटे किसानों के हक पर डाका डाल रहा है।
गोदामों में छिपा है 'सफेद झूठ' यदि रीवा और मऊगंज के गोदामों का निष्पक्ष भौतिक सत्यापन (Physical Verification) हो जाए, तो भारी मात्रा में अमानक और घटिया धान का बड़ा खुलासा हो सकता है। चर्चा है कि कई बड़े गोदाम रसूखदार नेताओं और प्रभावशाली अधिकारियों के संरक्षण में चल रहे हैं, जहाँ जांच की आंच पहुँचना नामुमकिन सा लगता है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती यद्यपि हनुमान और त्योंथर क्षेत्र में हालिया प्रशासनिक कार्रवाइयों ने खलबली मचाई है, लेकिन सवाल वही है—क्या ये कार्रवाइयां केवल छोटे प्यादों तक सीमित रहेंगी या बड़े मगरमच्छ भी सलाखों के पीछे होंगे? कालाबाजारी करने वाले व्यापारी अब राजनेताओं के माध्यम से अपनी 'फाइलें' सेट करने में जुट गए हैं। अब देखना यह होगा कि मऊगंज और रीवा के कलेक्टर इस वर्ष इन माफियाओं की कमर तोड़ पाते हैं, या फिर सत्ता और सिस्टम का यह 'गठबंधन' हर बार की तरह जांच को ठंडे बस्ते के हवाले कर देगा।
