रीवा में 'बुलडोजर' पर बवाल: अमहिया रोड के व्यापारियों का फूटा गुस्सा, चयनात्मक कार्रवाई के लगे गंभीर आरोप Aajtak24 News

रीवा में 'बुलडोजर' पर बवाल: अमहिया रोड के व्यापारियों का फूटा गुस्सा, चयनात्मक कार्रवाई के लगे गंभीर आरोप Aajtak24 News

रीवा - मध्य प्रदेश के रीवा जिले में प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' अब विवादों के भंवर में फंस गया है। शहर के हृदय स्थल अमहिया रोड पर जब प्रशासन का बुलडोजर पहुँचा, तो वहां वर्षों से रोजी-रोटी कमा रहे छोटे व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों का सब्र टूट गया। कार्रवाई के दौरान न केवल तीखी बहस हुई, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली और रीवा के कथित 'विकास मॉडल' पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए गए।

चयनात्मक कार्रवाई से उपजा आक्रोश

विरोध कर रहे व्यापारियों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि प्रशासन की कार्रवाई 'चयनात्मक' है। दुकानदारों का कहना है कि प्रशासन केवल उन गरीबों और छोटे व्यापारियों को निशाना बना रहा है जिनके पास कोई रसूख नहीं है। व्यापारियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि एक तरफ झोपड़ियों और छोटे फुटपाथियों को उजाड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर शहर के बड़े रसूखदारों और प्रभावशाली समूहों द्वारा किए गए पक्के अतिक्रमणों पर प्रशासनिक अमला 'मौन' साधे खड़ा है।

"बोया पेड़ बबूल का...": विकास की नीति पर प्रहार

व्यापारियों ने मुहावरे का सहारा लेते हुए कहा कि "बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होए"। उनका तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर जो अव्यवस्था फैलाई गई, उसका खामियाजा आज आम जनता भुगत रही है। स्थानीय लोगों का गंभीर आरोप है कि रीवा की बेशकीमती सरकारी जमीनें सुनियोजित तरीके से बड़े बिल्डरों और रसूखदारों को 'बंदरबांट' कर दी गईं। जो जमीनें कभी सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित थीं, वे आज निजी हाथों में हैं।

कहां गायब हुई सरकारी जमीन?

रीवा शहर की वर्तमान स्थिति यह है कि नए सरकारी कार्यालयों के निर्माण के लिए प्रशासन के पास उपयुक्त भूमि का अभाव बताया जा रहा है। नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर दशकों से उपलब्ध सरकारी जमीनें कहां और कैसे समाप्त हो गईं? क्या संबंधित विभागों ने निजी स्वार्थ के चलते बिना जांच-पड़ताल के स्वीकृतियां प्रदान कीं? शहर के पुराने बस स्टैंड का उदाहरण देते हुए लोगों ने कहा कि विकास के नाम पर जो बड़े वादे किए गए थे, आज उनकी वास्तविकता और स्वामित्व को लेकर जनता के मन में गहरे संदेह हैं।

न्यायिक जांच की उठती मांग

अमहिया रोड के व्यापारियों और जागरूक नागरिकों ने अब इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय या न्यायिक जांच की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  1. समान कार्रवाई: अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी हो और यह छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े रसूखदारों तक पर समान रूप से लागू हो।

  2. भूमि आवंटन की जांच: पिछले 10-15 वर्षों में शहर की प्रमुख सरकारी जमीनों के आवंटन और उपयोग की निष्पक्ष जांच हो।

  3. जवाबदेही तय हो: जिन अधिकारियों ने अवैध आवंटन या नियमों की अनदेखी कर रसूखदारों को लाभ पहुंचाया, उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

भरोसे का संकट और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

शहर में यह चर्चा भी जोरों पर है कि आखिर जनप्रतिनिधि इस 'चयनात्मक' कार्रवाई पर चुप क्यों हैं? लोगों का कहना है कि यदि विकास का अर्थ केवल गरीबों को हटाना है, तो ऐसा विकास जनहित में नहीं हो सकता। प्रशासन की चुप्पी ने इस आक्रोश को और हवा दी है। रीवा का यह घटनाक्रम अब केवल सड़कों को चौड़ा करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जनविश्वास की कसौटी बन गया है। यदि प्रशासन ने समय रहते अपनी छवि नहीं सुधारी और निष्पक्षता से काम नहीं लिया, तो यह असंतोष एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। जनता अब केवल 'स्मार्ट सिटी' का बोर्ड नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समान व्यवहार चाहती है।

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