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| विंध्य में 'उज्ज्वला' पर भ्रष्टाचार का काला साया: लालगांव गैस एजेंसी पर FIR, करोड़ों की लूट और अरबों के घोटाले की सुगबुगाहट! Aajtak24 News |
रीवा - प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, जिसका उद्देश्य गरीब परिवारों की रसोई तक धुआं-मुक्त ईंधन पहुंचाना है, विंध्य क्षेत्र में 'सफेदपोश लुटेरों' की भेंट चढ़ गई है। रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में गैस एजेंसी संचालकों और विभागीय मिलीभगत से शासन को करोड़ों रुपये की चपत लगाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। लालगांव स्थित इंडेन गैस एजेंसी पर हुई एफआईआर ने इस बड़े सिंडिकेट की पोल खोल दी है।
लालगांव एजेंसी पर ₹1.34 करोड़ का गबन उजागर
सहायक आपूर्ति अधिकारी की जांच के बाद पुलिस ने लालगांव की इंडेन ग्रामीण वितरक गैस एजेंसी के संचालक अमित वर्मा और कर्मचारी उमेश चंद्र के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। जांच में प्रथम दृष्टया ₹1,34,17,517 (एक करोड़ चौंतीस लाख से अधिक) की अनियमितता पाई गई है। यह राशि उन गरीब हितग्राहियों के हक की थी, जिन्हें शासन की योजना का लाभ मिलना था।
लूट का तरीका: फर्जी बुकिंग और कालाबाजारी
जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि एजेंसी संचालक कागजों पर 'जादुई वितरण' कर रहे थे:
काल्पनिक रिफिलिंग: उपभोक्ताओं के नाम पर फर्जी तरीके से रिफिल बुक कर दी गई, जबकि हकीकत में उन्हें सिलेंडर मिला ही नहीं।
सब्सिडी की डकैती: ग्रामीण उपभोक्ताओं को 'कैश एंड कैरी' (खुद ले जाने वाले) के बजाय ऑनलाइन 'होम डिलीवरी' दिखाकर उनसे न केवल अधिक पैसे वसूले गए, बल्कि उनकी सब्सिडी भी हड़प ली गई।
स्टॉक से गायब सिलेंडर: भौतिक सत्यापन में 189 खाली और 108 भरे हुए सिलेंडर स्टॉक से गायब मिले। स्पष्ट है कि इन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए ऊंचे दामों पर कालाबाजारी में खपा दिया गया।
पूरे विंध्य में फैला है जाल: SIT जांच की मांग
यह मामला केवल लालगांव तक सीमित नहीं है। रीवा और मऊगंज के कई अन्य क्षेत्रों से भी ऐसी ही गंभीर शिकायतें मिल रही हैं:
मऊगंज जिला: नईगढ़ी, भीर और मऊगंज शहर की एजेंसियां संदेह के घेरे में हैं।
रीवा जिला: कलवारी, लालगांव और मनगवां क्षेत्रों में भी कागजी वितरण का खेल चल रहा है।
स्थानीय जागरूक नागरिकों और पीड़ित उपभोक्ताओं का कहना है कि यह खाद्य विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और एजेंसी संचालकों का एक संगठित गठजोड़ है। मांग उठ रही है कि रीवा और मऊगंज के कलेक्टर एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित करें, जो पिछले 4 वर्षों के रिकॉर्ड खंगाले। यदि निष्पक्ष जांच हुई, तो यह घोटाला अरबों रुपये तक पहुँच सकता है।
गरीबों की रसोई में अब भी 'धुआं'
विडंबना देखिए कि कागजों पर जिन हितग्राहियों को चूल्हा और सिलेंडर 'वितरित' दिखा दिया गया, वे आज भी जंगलों से लकड़ियां बीनने और धुएं में खाना बनाने को मजबूर हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के उल्लंघन के साथ-साथ यह गरीबों के मौलिक अधिकारों पर भी कड़ा प्रहार है। अब देखना यह है कि प्रशासन केवल एक-दो छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके शांत बैठ जाता है या इस 'गैस माफिया' के मगरमच्छों तक भी पहुँचता है।
