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| रीवा में पत्रकारिता बनाम विज्ञापन का 'महायुद्ध': स्वास्थ्य सेवाओं के विज्ञापनों की चमक में गुम हो रहे जनहित के मुद्दे Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य के केंद्र रीवा में इन दिनों पत्रकारिता और विज्ञापन जगत के बीच का संतुलन बुरी तरह डगमगाता नजर आ रहा है। शहर के प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के पन्ने इन दिनों निजी नर्सिंग होम, क्लीनिक और डायग्नोस्टिक सेंटरों के भव्य विज्ञापनों से पटे पड़े हैं। हैरानी की बात यह है कि जहाँ विज्ञापन बढ़ रहे हैं, वहीं इन संस्थानों की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की निष्पक्षता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
आर्थिक दबाव और निर्भीकता का अंत
बड़ा सवाल यह है कि क्या इन विज्ञापनों से मिलने वाला भारी-भरकम राजस्व मीडिया संस्थानों की कलम पर अंकुश लगा रहा है? जब अखबार का मुख्य पृष्ठ और अंतिम पृष्ठ लाखों के विज्ञापनों से सुसज्जित होता है, तो अक्सर उन विज्ञापनों के पीछे छिपे अवैध नर्सिंग होम संचालन, डॉक्टरों की लापरवाही और मेडिकल माफिया की खबरें रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती हैं। यह व्यावसायिक मजबूरी है या सोची-समझी रणनीति, इसकी जांच होना आवश्यक है।
ब्यूरो चीफ या बिचौलिए?
सूत्रों का दावा है कि रीवा में कुछ समाचार पत्रों ने संपादकीय और ब्यूरो स्तर पर ऐसी नियुक्तियां की हैं जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है। इनका मुख्य कार्य पत्रकारिता करना नहीं, बल्कि विज्ञापनों के माध्यम से संस्थान के लिए धन जुटाना है। जब संपादकीय डेस्क का ध्यान खबरों की बजाय व्यावसायिक लाभ पर केंद्रित हो जाता है, तो जनता के प्रति जवाबदेही खत्म होने लगती है।
विज्ञापनों के धन का स्रोत क्या है?
प्रतिमाह लाखों रुपये के विज्ञापनों का भुगतान आखिर कौन कर रहा है? क्या यह पैसा उन गरीब मरीजों की जेब से निकल रहा है जो इलाज के नाम पर लूटे जा रहे हैं? यह भी जांच का विषय है कि क्या विज्ञापन देने वाले डॉक्टर या मेडिकल स्टोर संचालक इस खर्च को अपनी वार्षिक आय और आयकर रिटर्न में दर्शा रहे हैं। यदि नहीं, तो क्या आयकर विभाग और स्वास्थ्य विभाग इस संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की निगरानी कर रहा है?
प्रशासनिक चुप्पी और 'म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग'
रीवा में इस पूरे विज्ञापन तंत्र के फलने-फूलने के पीछे प्रशासनिक मौन भी एक बड़ा कारण प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि पर्दे के पीछे एक अघोषित 'समझौता' काम कर रहा है—जहां मीडिया प्रशासन की नाकामियों पर सवाल नहीं उठाता और प्रशासन मीडिया की इन संदिग्ध गतिविधियों से आंखें मूंद लेता है।
जिम्मेदारी किसकी?
इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज के सबसे महत्वपूर्ण अंगों—मीडिया और स्वास्थ्य विभाग—को उनकी नैतिक जिम्मेदारी याद दिलाना है। पत्रकारिता का धर्म भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना है, न कि भ्रष्टाचार को विज्ञापनों की चादर से ढंकना। रीवा के पाठकों को भी अब जागना होगा और उन मीडिया संस्थानों का समर्थन करना होगा जो आज भी बिना डरे सच को सामने लाने का साहस रखते हैं। यदि आज जवाबदेही तय नहीं की गई, तो आने वाले समय में आर्थिक हितों के आगे जनहित पूरी तरह बलि चढ़ जाएगा।
