रीवा-मऊगंज की पंचायतों में 'पेपर ब्लॉक' का 'ब्लॉकबस्टर' भ्रष्टाचार: 50% कमीशन की भेंट चढ़ रहा विकास Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज की पंचायतों में 'पेपर ब्लॉक' का 'ब्लॉकबस्टर' भ्रष्टाचार: 50% कमीशन की भेंट चढ़ रहा विकास Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र के रीवा और नवगठित मऊगंज जिले की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की आड़ में भ्रष्टाचार का एक नया और संगठित मॉडल सामने आया है। पंचायतों में सीसी रोड या अन्य आवश्यक स्थायी निर्माण कार्यों को दरकिनार कर केवल ‘पेपर ब्लॉक’ (इंटरलॉकिंग टाइल्स) बिछाने के काम को प्राथमिकता दी जा रही है। आरोप है कि इस प्राथमिकता के पीछे जनसेवा नहीं, बल्कि 50 प्रतिशत तक की फिक्स कमीशनखोरी का एक बड़ा खेल है, जो सफेदपोशों और प्रभावशाली अधिकारियों के संरक्षण में फल-फूल रहा है।

साइन ट्रेडर्स और रसूखदार 'बाबू' का कनेक्शन स्थानीय सूत्रों और जागरूक जनप्रतिनिधियों द्वारा किए गए खुलासे के अनुसार, इस पूरे गोरखधंधे का केंद्र रीवा स्थित ‘साइन ट्रेडर्स’ नाम की एक फर्म बताई जा रही है। चर्चा है कि इस फर्म का वास्तविक नियंत्रण शिक्षा या अन्य विभाग से जुड़े एक प्रभावशाली बाबू के हाथों में है, जो अपने पद और रसूख का इस्तेमाल कर दोनों जिलों की पंचायतों में पेपर ब्लॉक की सप्लाई और निर्माण कार्य को 'हाइजैक' कर चुका है। इसी फर्म के माध्यम से पंचायतों को सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है और भुगतान के बदले मोटा कमीशन वसूला जा रहा है।

कमीशन का गणित: आधा पैसा भ्रष्टाचार की भेंट सूत्रों द्वारा जो 'कमीशन चार्ट' साझा किया गया है, वह चौंकाने वाला है। कथित तौर पर इस कार्य के लिए स्वीकृत राशि का लगभग आधा हिस्सा भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाता है:

  • 25 प्रतिशत: सरपंच (कथित हिस्सा)

  • 10 प्रतिशत: सचिव और रोजगार सहायक

  • 10 प्रतिशत: संबंधित जनपद और तकनीकी अधिकारी

  • 05 प्रतिशत: अन्य खर्च और 'ऊपर' की सेटिंग इस प्रकार, कुल बजट का 50 प्रतिशत हिस्सा काम शुरू होने से पहले ही बंदरबांट हो जाता है। शेष 50 फीसदी राशि में ठेकेदार अपना मुनाफा निकालता है और अंत में जो बचता है, उससे घटिया गुणवत्ता की सामग्री उपयोग की जाती है। यही कारण है कि पंचायतों में लगाए गए पेपर ब्लॉक कुछ ही महीनों में उखड़ने और टूटने लगे हैं।

कमजोर वर्ग के सरपंचों को बनाया जा रहा मोहरा भ्रष्टाचार के इस खेल का सबसे काला पक्ष यह है कि आरक्षित, महिला या कमजोर पृष्ठभूमि वाले सरपंचों को निशाना बनाया जा रहा है। आरोप है कि प्रभावशाली अधिकारियों और दलालों के माध्यम से इन सरपंचों पर दबाव बनाया जाता है कि वे केवल पेपर ब्लॉक का काम ही स्वीकृत करें। कई मामलों में तो सरपंचों की मर्जी के बिना ही जनपद स्तर से फाइलें तैयार करवा ली जाती हैं और उन्हें केवल हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया जाता है। यदि कोई विरोध करता है, तो उसे प्रशासनिक जांच या बजट रोकने की धमकी दी जाती है।

स्थायी विकास की अनदेखी तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि जिन स्थानों पर भारी वाहनों का आवागमन होता है, वहाँ पीसीसी (Plain Cement Concrete) रोड अधिक टिकाऊ होती है। लेकिन पीसीसी रोड में कमीशन की गुंजाइश कम होती है और निर्माण में समय लगता है। इसके विपरीत, पेपर ब्लॉक का कार्य तेजी से होता है और इसमें गुणवत्ता छिपाना आसान होता है। अधिकारियों की इसी मानसिकता के कारण गांवों में स्थायी बुनियादी ढांचे का नुकसान हो रहा है।

उच्च स्तरीय जांच की मांग: कौन बनेगा बेनकाब? रीवा और मऊगंज के सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने अब इस मामले में मुख्यमंत्री और संभागायुक्त से उच्च स्तरीय और स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि ‘साइन ट्रेडर्स’ जैसी फर्मों के बैंक खातों और संबंधित अधिकारियों के कॉल डिटेल्स की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो एक बहुत बड़ा सिंडिकेट बेनकाब हो सकता है।

प्रशासनिक रुख हालांकि जिला प्रशासन द्वारा कुछ पंचायतों में औचक निरीक्षण की खबरें सामने आई हैं, लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि जब तक 'ऊपर' बैठे खिलाड़ियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह खेल बंद नहीं होगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रशासन इन गंभीर आरोपों की गहराई तक जाता है या फिर भ्रष्टाचार की यह 'पेपर ब्लॉक' दीवार विकास को ऐसे ही दबाती रहेगी।

रीवा-मऊगंज की पंचायतों से उठ रही यह आवाज प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। पंचायतों के बजट को एक विशेष फर्म और सिंडिकेट की तिजोरी में भरने का यह खेल यदि नहीं रुका, तो ग्रामीण विकास केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।

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