पैक्स सोसाइटियों में 'सफेदपोश' डकैती; दिवालिया हो रही संस्थाएं, मालामाल हो रहे कर्मचारी! Aajtak24 News


पैक्स सोसाइटियों में 'सफेदपोश' डकैती; दिवालिया हो रही संस्थाएं, मालामाल हो रहे कर्मचारी! Aajtak24 News

रीवा - प्रदेश की सहकारी साख समितियों (PAX) में भ्रष्टाचार का ऐसा दीमक लगा है जो सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। 'आजतक 24' के विशेष इन्वेस्टिगेशन में यह खुलासा हुआ है कि जिले की अधिकांश सोसाइटियां अब केवल "कमाओ-खाओ और हिस्सा बांटो" के फार्मूले पर चल रही हैं।

प्रभार का खेल और गायब अभिलेख

हैरानी की बात यह है कि समितियों में कर्मचारियों की भारी कमी का बहाना बनाकर एक-एक प्रबंधक को तीन से चार संस्थाओं का प्रभार दे दिया गया है। 'आजतक 24' की पड़ताल बताती है कि जब नए प्रशासक नियुक्त होते हैं, तो वे पुराने कार्यकाल की कैश बुक, हिस्सा रजिस्टर या स्टॉक रजिस्टर की जांच तक नहीं करते। इसी का फायदा उठाकर पुराने प्रबंधक स्थानांतरण के समय सिलाई मशीन, इलेक्ट्रॉनिक कांटे और कैमरों जैसे सामान ही गायब कर देते हैं।

तिरपाल और बारदाने का 'करोड़ों' का खेल

रीवा जिले में हर साल खरीदी के नाम पर करोड़ों रुपए की तिरपाल और पन्नी खरीदी जाती है। लेकिन सीजन खत्म होते ही ये तिरपाल कहां जाते हैं, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। जूट और प्लास्टिक के बारदानों के स्टॉक में भी भारी हेरफेर है। सूत्रों के मुताबिक, बांस, लालगांव, देवास, कटरा और परासी जैसी संस्थाओं के पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएं, तो अरबों का घोटाला उजागर हो सकता है, क्योंकि यहां के पुराने अभिलेख या तो 'गायब' कर दिए गए हैं या उनमें भारी काट-छाँट की गई है।

ऑडिट के नाम पर 'रेट फिक्सिंग'

सहकारी समितियों में ऑडिट के नाम पर भी बड़ा खेल चल रहा है। चर्चा है कि ऑडिट का रेट खरीदी की मात्रा के हिसाब से तय होता है। जितना ज्यादा अनाज खरीदा गया, उतना ही मोटा कमीशन ऑडिट पास कराने के लिए लिया जाता है। समितियों की देनदारी कितनी है और कमीशन कितना लंबित है, इसकी जानकारी न तो प्रशासकों को है और न ही कार्यवाहक प्रबंधकों को।

फर्जी कर्ज और कर्मचारियों की काली कमाई

एक ओर समितियां दिवालिया हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर वहां कार्यरत 'समिति सेवकों' की आय में कई गुना वृद्धि हो रही है। समितियों में फर्जी कर्ज (Fake Loans) बांटने के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। कई ऐसे कर्मचारी हैं जिनका मामला न्यायालय में लंबित है, फिर भी संस्था न उनका विरोध कर रही है और न ही पक्ष रख रही है, बल्कि उन्हें नियमित वेतन वृद्धि का लाभ दिया जा रहा है। यदि सरकार ने इन सोसाइटियों के अभिलेखों का गहन मिलान नहीं कराया, तो वह दिन दूर नहीं जब किसानों की यह जीवन रेखा पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। 'आजतक 24' शासन-प्रशासन से सवाल करता है कि आखिर इन भ्रष्ट समिति प्रबंधकों पर नकेल कब कसी जाएगी?

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