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| 'फाइलों' के बोझ तले दबा गरीब का 'हक'; मुस्तरका भूमि विवाद में न्याय के लिए दर-दर भटक रहा अशिक्षित किसान! Aajtak24 News |
रीवा/कोनिया - मध्य प्रदेश सरकार के 'न्याय सबके द्वार' और 'निःशुल्क विधिक सहायता' के बड़े-बड़े दावे उस समय दम तोड़ते नजर आते हैं, जब लवरी गांव के एक अशिक्षित किसान की सिसकती हुई दास्तां सामने आती है। 'आजतक 24' की विशेष पड़ताल में खुलासा हुआ है कि तहसील कोनिया (मंडमा) के निवासी अंबिका भारती पिछले कई वर्षों से अपनी ही जमीन के लिए सरकारी दफ्तरों की धूल फांक रहे हैं, लेकिन न्याय की जगह उन्हें केवल 'तारीखें' और 'आश्वासन' मिल रहे हैं।
क्या है पूरा विवाद? सादगी और धोखे की कहानी
अंबिका भारती, पिता राम मनोहर भारती, लवरी गांव के एक सीधे-साधे और अशिक्षित किसान हैं। उनकी पीड़ा यह है कि उनकी मुस्तरका (संयुक्त) भूमि को उनके ही सह-हिस्सेदारों ने उनकी जानकारी के बिना खुर्द-बुर्द कर दिया। अंबिका का आरोप है कि भूमि की बिक्री के समय न तो उनकी सहमति ली गई और न ही उन्हें बिक्री से प्राप्त राशि का हिस्सा दिया गया। अब स्थिति यह है कि माफियाओं और चतुर हिस्सेदारों ने कीमती जमीन बेच दी और अंबिका के पास जो बचा है, उस पर भी विवाद खड़ा किया जा रहा है। अंबिका की मांग बहुत सीधी है: “जितनी जमीन पहले बेची गई है, उसे हिस्सेदारों के खाते से काटा जाए और शेष बची हुई मुस्तरका भूमि में मुझे मेरा बराबर का हिस्सा दिया जाए।”
प्रशासनिक भूलभुलैया: वही सवाल, वही जवाब
'आजतक 24' ने जब इस मामले की जमीनी हकीकत जानी, तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। अंबिका भारती जब भी तहसील या एसडीएम कार्यालय जाते हैं, तो अधिकारी उनसे केवल बुनियादी सवाल—नाम, पिता का नाम और पता—पूछकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। एसडीएम और तहसीलदार साहब का कहना है कि यह मामला पुराने एसडीओ के आदेशों से जुड़ा है, इसलिए पुराने खसरे और दस्तावेज पेश किए जाएं। सवाल यह उठता है कि जो किसान ठीक से अपना नाम नहीं लिख सकता, वह दशकों पुराने खसरे और जटिल राजस्व दस्तावेज कहां से लाएगा? क्या प्रशासन की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपने रिकॉर्ड रूम से दस्तावेज निकालकर पीड़ित को न्याय दिलाए?
निःशुल्क विधिक सहायता: केवल विज्ञापनों तक सीमित?
सरकार दावा करती है कि गरीबों और अशिक्षितों के लिए अदालतों में वकील और विधिक सहायता मुफ्त है। लेकिन अंबिका भारती और उनके पुत्र विनोद भारती की हालत देखकर लगता है कि यह सहायता केवल फाइलों और होर्डिंग्स तक सीमित है। परिवार के पास कानूनी समझ की कमी है, जिसका फायदा उठाकर राजस्व अमला उन्हें प्रक्रियाओं के जाल में उलझाए हुए है।
आजतक 24 के तीखे सवाल: आखिर न्याय कब?
क्या गरीब और अशिक्षित होना अपराध है कि उन्हें न्याय पाने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है?
यदि सह-हिस्सेदारों ने बिना सहमति जमीन बेची, तो पंजीयन विभाग ने इसकी जांच क्यों नहीं की?
राजस्व अधिकारी केवल दस्तावेज क्यों मांग रहे हैं? क्या वे अपनी शक्तियों का प्रयोग कर स्वतः संज्ञान नहीं ले सकते?
अंबिका भारती का कहना है कि वे किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते, केवल अपना हक चाहते हैं। लेकिन प्रशासन की उदासीनता उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ रही है। लोग अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते थककर बैठ जाते हैं और अंततः भू-माफिया उनके अधिकारों को निगल जाते हैं।
