"अब ग्राम सभा के हाथ में होगा गांव का खजाना: अगले साल से सीधे खातों में आएगा विकास का पैसा! Aajtak24 News

"अब ग्राम सभा के हाथ में होगा गांव का खजाना: अगले साल से सीधे खातों में आएगा विकास का पैसा! Aajtak24 News

भोपाल - मध्यप्रदेश में जनजातीय स्वशासन की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने स्पष्ट कर दिया है कि पेसा (पंचायत उपबंध - अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह गांवों के स्वाभिमान और उनके प्राकृतिक संसाधनों पर उनके संवैधानिक अधिकार की पुनर्स्थापना है। हाल ही में भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला में मंत्री श्री पटेल ने जो रोडमैप पेश किया, वह राज्य की सभी पेसा ग्राम सभाओं, सरपंचों और सचिवों के लिए भविष्य की नई दिशा तय करता है।

1. विकास की नई वित्तीय व्यवस्था: सीधे ग्राम सभा को मिलेगा पैसा

अभी तक गांवों के विकास कार्यों के लिए फंड लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से होकर गुजरता था, लेकिन अब व्यवस्था बदलने वाली है। मंत्री श्री पटेल ने घोषणा की है कि आगामी वित्तीय वर्ष से ग्राम सभाओं को सीधे वित्तीय राशि हस्तांतरित (Direct Fund Transfer) करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरपंच और ग्राम सभा अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर बजट का उपयोग कर सकेंगे। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि 'स्थानीय स्वशासन' की अवधारणा कागजों से निकलकर सीधे चौपाल तक पहुंचेगी। सचिवों को निर्देश दिए गए हैं कि वे ई-ग्राम स्वराज पोर्टल में पारंगत हों, ताकि तकनीकी कारणों से गांव का पैसा न रुके।

न्याय व्यवस्था में क्रांति: 11 हजार विवादों का चौपाल पर समाधान

पेसा कानून की सबसे बड़ी सफलता उसकी 'शांति एवं विवाद निवारण समितियों' में दिख रही है। मंत्री जी ने बताया कि मध्यप्रदेश में ग्राम सभाओं ने अपनी पारंपरिक न्याय पद्धति से 11 हजार से अधिक प्रकरणों का समाधान किया है। यह उन ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत है जिन्हें छोटे-मोटे झगड़ों के लिए मीलों दूर थाने या कचहरी के चक्कर काटने पड़ते थे और मोटी फीस चुकानी पड़ती थी। अब ग्राम सभा की 'पारंपरिक चौपाल' ही अदालत है, जहां बुजुर्गों के अनुभव और सामुदायिक भाईचारे से न्याय सुनिश्चित हो रहा है।

संसाधनों पर 'सुप्रीम' अधिकार: जल, जंगल और जमीन

"जल-जंगल-जमीन" का नारा अब हकीकत बन चुका है। मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि:

  • खनन पट्टे: गांव की सीमा में किसी भी प्रकार के खनन या उत्खनन के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।

  • लघु वनोपज: तेंदूपत्ता, महुआ और अन्य वनोपज के संग्रहण और विक्रय का अधिकार अब पूरी तरह ग्राम सभा के पास है।

  • प्रशासनिक दखल पर रोक: कलेक्टर और एसडीओ (राजस्व) को निर्देश दिए गए हैं कि वे केवल निगरानी और सहायता करें, ग्राम सभा के अधिकारों में हस्तक्षेप न करें।

अधिकारियों को चेतावनी: "फाइल नहीं, बदलाव चाहिए"

मंत्री श्री प्रह्लाद सिंह पटेल का लहजा उन अधिकारियों के लिए सख्त था जो केवल कागजी रिपोर्टिंग में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा कि योजनाओं की सफलता फाइलों की मोटाई से नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति के जीवन में आए बदलाव से आंकी जाएगी। जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (CEO) को स्पष्ट किया गया है कि वे ग्राम सभाओं को प्रशासनिक बाधाओं में न उलझाएं। जिला और विकासखंड समन्वयकों का काम अब केवल दफ्तर में बैठना नहीं, बल्कि हर सप्ताह गांवों में जाकर ग्रामीणों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना होगा।

मध्यप्रदेश का बढ़ता कद: देश में दूसरा स्थान

मध्यप्रदेश ने पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में पूरे देश में महाराष्ट्र के बाद दूसरा स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि राज्य की 900 से अधिक नई गठित ग्राम सभाओं और उनके सक्रिय सदस्यों की मेहनत का परिणाम है। हाल ही में आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम में आयोजित राष्ट्रीय पेसा महोत्सव में प्रदेश के जनजातीय खिलाड़ियों ने जो कमाल दिखाया (पुरुष वर्ग में गोल्ड और महिला वर्ग में सिल्वर), उसने यह साबित कर दिया कि पेसा क्षेत्रों के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। सरकार अब इन क्षेत्रों में खेल और कौशल विकास पर भी विशेष ध्यान देगी।

6. स्थानीय भाषा और संस्कृति के जरिए जागरूकता

पेसा कानून का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए अब सरकारी विज्ञापनों के बजाय स्थानीय बोलियों, लोकगीतों, नुक्कड़ नाटकों और हाट-बाजारों का सहारा लिया जाएगा। सचिवों और मोबिलाइजरों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे जनजातीय संस्कृति का सम्मान करते हुए कानून की बारीकियों को समझाएं, ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित न रहे।

सरपंच और सचिव की भूमिका हुई और भी महत्वपूर्ण इस पूरी कार्यशाला का निचोड़ यह है कि अब सरपंच केवल निर्माण कार्य कराने वाले प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और अधिकारों के रक्षक भी हैं। सचिव अब केवल रिकॉर्ड रखने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि डिजिटल सशक्तिकरण के वाहक हैं। सरकार ने अपना संकल्प दोहरा दिया है, अब गेंद ग्राम सभाओं के पाले में है।

"पेसा कानून जनजातीय समाज के गौरव की वापसी है। हम ग्राम सभाओं को इतना सशक्त बनाएंगे कि वे स्वयं अपने गांव की नियति तय करें।" — प्रह्लाद सिंह पटेल, मंत्री

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