रीवा-मऊगंज में माफियाओं का अभूतपूर्व दबदबा: प्रशासनिक ढिलाई से आमजन में असंतोष Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज में माफियाओं का अभूतपूर्व दबदबा: प्रशासनिक ढिलाई से आमजन में असंतोष Aajtak24 News

रीवा - अपनी ऐतिहासिक धरोहर और शांतिपूर्ण सामाजिक सौहार्द के लिए पहचाने जाने वाले रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों माफियाओं का वर्चस्व चर्चा का विषय बना हुआ है। जिले के आम नागरिक, किसान और व्यापारी संगठित आपराधिक गिरोहों के बढ़ते प्रभाव से आशंकित हैं। चारों तरफ यह चर्चा है कि प्रशासनिक तंत्र इन माफियाओं के सामने बेबस नजर आ रहा है, जिसके चलते कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

माफियाओं का जाल: हर क्षेत्र में पैठ

सूत्रों और ग्रामीणों की शिकायतों के अनुसार, जिले में माफियाओं ने लगभग हर क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली है। इसमें दारू माफिया, नशीली कफ सिरप माफिया, शिक्षा माफिया, खनन माफिया, परिवहन माफिया और खाद्यान्न माफिया प्रमुख हैं। आरोप है कि अवैध कारोबार धड़ल्ले से चल रहे हैं और इनके खिलाफ होने वाली कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। विशेषकर अवैध शराब की पाइकारी को लेकर हालात अत्यंत चिंताजनक हैं। कई गांवों और ग्राम पंचायतों में घनी आबादी के बीच अवैध शराब की दुकानों के संचालन से सामाजिक ताना-बाना टूट रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इन दुकानों के आसपास नशेड़ियों की भीड़ और विवाद आए दिन की बात हो गई है, जो कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं।

त्योहारों की खुशियों पर विवाद की छाया

माफियाओं के बढ़ते हौसले का असर अब त्योहारों पर भी दिखने लगा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि नशीले पदार्थों के बढ़ते चलन और प्रशासनिक ढिलाई के कारण छोटी-छोटी घटनाओं ने बड़े विवादों का रूप लेना शुरू कर दिया है। होली जैसे सौहार्दपूर्ण पर्वों पर भी अब तनाव और विवाद की आशंका बनी रहती है, जो कि जिले के लिए एक बुरा संकेत है।

जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल

जनभावनाओं में असंतोष स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जिन जनप्रतिनिधियों को कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन सुनिश्चित करना चाहिए, वे खुलकर माफियाओं के खिलाफ विरोध दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी समीकरणों और राजनीतिक संरक्षण के चलते कठोर कदम उठाने से परहेज किया जा रहा है, जिससे माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।

शासकीय भूमि और संगठित अपराध

शासकीय संस्थाओं की जमीनों पर अतिक्रमण और संगठित अपराधों को कानूनी प्रक्रिया की आड़ में अंजाम देने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई का दावा करते हैं, किंतु जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखते हैं।

आगे की राह और जनता की अपेक्षाएं

हालात चाहे जो भी हों, यह स्पष्ट है कि रीवा और मऊगंज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कानून व्यवस्था, अवैध कारोबार पर नियंत्रण और प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी मांग है। जनता अब धर्म, जाति या बाहरी मुद्दों से परे स्थानीय समस्याओं के समाधान की अपेक्षा कर रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सामाजिक असंतोष और गहरा सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि जनभावनाओं को किस प्रकार संज्ञान में लेते हैं और क्षेत्र को पुनः शांति व विकास की राह पर लाने के लिए क्या ठोस रणनीति अपनाते हैं।

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