| मध्य प्रदेश राजस्व विभाग की तकनीकी चूक का खामियाजा भुगत रहे भू-स्वामी; 'कलेक्टर लॉगिन' पर अटकीं सुधार की फाइलें Aajtak24 News |
रीवा - मध्य प्रदेश के राजस्व विभाग में डिजिटल सुधारों और 'ई-गवर्नेंस' के बड़े-बड़े दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। प्रदेश के अनेक जिलों, विशेषकर रीवा संभाग में भूमि अभिलेखों (Land Records) में हुई गंभीर त्रुटियों ने हजारों भू-स्वामियों की रातों की नींद उड़ा दी है। जानकारी के अनुसार, राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में निजी स्वामित्व की भूमियों को 'शासकीय भूमि' (Sarkari Zameen) के रूप में दर्ज कर दिया गया है। यह न केवल एक तकनीकी त्रुटि है, बल्कि वास्तविक मालिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी है।
प्रक्रिया पूर्ण, फिर भी 'अंतिम मुहर' का इंतजार
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रभावित भू-स्वामियों ने भूमि सुधार के लिए लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली है। नियमानुसार, संबंधित तहसीलदारों और अनुविभागीय अधिकारियों (SDM) द्वारा दस्तावेजों की सूक्ष्म जांच की जा चुकी है। जांच के बाद इन अधिकारियों ने रिकॉर्ड सुधार के लिए स्पष्ट अनुशंसा (Recommendation) भी भेज दी है। लेकिन, असली बाधा 'कलेक्टर लॉगिन आईडी' के स्तर पर आकर रुक गई है। महीनों बीत जाने के बाद भी कलेक्टर महोदय की आईडी से इन प्रकरणों को अंतिम अनुमोदन (Approval) नहीं मिल सका है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा का विषय है कि जब जमीनी स्तर पर जांच पूरी हो चुकी है, तो अंतिम स्वीकृति में इतना विलंब क्यों हो रहा है?
किसानों और भू-स्वामियों पर पड़ रहा है 'दोहरा प्रहार'
अभिलेखों में सुधार न होने के कारण आम नागरिक और किसान कई स्तरों पर प्रताड़ित हो रहे हैं। उनकी निजी भूमि सरकारी रिकॉर्ड में 'शासकीय' दर्ज होने के कारण निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं:
वित्तीय संकट: रिकॉर्ड दुरुस्त न होने के कारण बैंक न तो नया फसल ऋण (KCC) दे रहे हैं और न ही किसी अन्य प्रकार का लोन स्वीकृत कर रहे हैं।
क्रय-विक्रय पर रोक: अपनी ही जमीन होने के बावजूद किसान उसे बेच नहीं पा रहे हैं, जिससे बच्चों की शिक्षा, विवाह या चिकित्सा जैसे आपातकालीन कार्यों के लिए धन जुटाना असंभव हो गया है।
नामांतरण और बंटवारा: पारिवारिक बंटवारे और नामांतरण (Mutation) की प्रक्रियाएं ठप हैं, जिससे भविष्य में जमीनी विवाद बढ़ने की आशंका प्रबल हो गई है।
सरकारी योजनाओं से वंचित: कई सरकारी सब्सिडी और योजनाओं का लाभ लेने के लिए 'साफ सुथरा' भू-अभिलेख अनिवार्य है, जो इन त्रुटियों के कारण उपलब्ध नहीं है।
कमिश्नर और प्रमुख सचिव तक पहुँचा मामला
प्रशासनिक शिथिलता से तंग आकर अब प्रभावितों ने उच्च स्तर पर गुहार लगाई है। इस संबंध में एक विस्तृत शिकायत पत्र कमिश्नर संभाग रीवा और प्रमुख सचिव (राजस्व विभाग), भोपाल को प्रेषित किया गया है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि यदि समय रहते इन लंबित आदेशों को स्वीकृत नहीं किया गया, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का चरम उदाहरण माना जाएगा।
उठते सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?
यह स्थिति न केवल आम नागरिकों के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि शासन की पारदर्शी व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। जानकारों का कहना है कि यदि तकनीकी रूप से रिकॉर्ड बदलना संभव है, तो कलेक्टर लॉगिन पर फाइलों को महीनों तक लंबित रखना न्यायोचित नहीं है।
मांग और निष्कर्ष: संबंधित भू-स्वामियों और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि:
कलेक्टर लॉगिन पर लंबित सभी प्रकरणों के लिए एक 'विशेष समय-सीमा' तय की जाए।
भविष्य में ऐसी तकनीकी त्रुटियों (जहां निजी भूमि सरकारी दर्ज हो जाए) को रोकने के लिए पोर्टल में सुधार किया जाए।
दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
अब देखना यह है कि रीवा संभाग और प्रदेश का राजस्व प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कितनी तत्परता दिखाता है। क्या प्रभावित किसानों को उनका हक मिलेगा या वे इसी तरह दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर रहेंगे?