रीवा-मऊगंज में बिजली बिलों का 'करंट': ₹100 से सीधे हजारों-लाखों तक पहुँचा आंकड़ा, जनता में भारी आक्रोश Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज में बिजली बिलों का 'करंट': ₹100 से सीधे हजारों-लाखों तक पहुँचा आंकड़ा, जनता में भारी आक्रोश Aajtak24 News

मऊगंज - मध्य प्रदेश के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर रीवा और मऊगंज जिलों में इन दिनों बिजली के बिल उपभोक्ताओं की कमर तोड़ रहे हैं। कभी ₹100 महीने के बिल पर बिजली का उपयोग करने वाले ग्रामीण अब हजारों और लाखों के बिल देखकर हतप्रभ हैं। स्थिति यह है कि जनता अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।

₹100 का वादा और वर्तमान की कड़वी हकीकत

पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू की गई योजना के तहत ग्रामीण उपभोक्ताओं को न्यूनतम ₹100 मासिक बिल की सुविधा दी गई थी। यह सिलसिला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल तक भी काफी हद तक जारी रहा। लेकिन वर्तमान मोहन यादव सरकार के एक साल के कार्यकाल के दौरान बिजली विभाग के तेवर पूरी तरह बदल गए हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि अब उन्हें 15 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक के मनमाने बिल थमाए जा रहे हैं। 

धार्मिक भावनाओं के बीच दबा जनहित का मुद्दा

क्षेत्र के नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय सनातन, पाकिस्तान, चीन और हिंदू-मुसलमान जैसे भावनात्मक मुद्दों की लहर में असली मुद्दे गौण हो गए। जनता का आरोप है कि वर्तमान सरकार अवैध विद्युत प्रयोग रोकने में नाकाम है। एक ओर जहाँ बस्तियों में बिना मीटर के धड़ल्ले से बिजली जल रही है, वहीं दूसरी ओर वैध कनेक्शन धारियों पर सारा बोझ डाला जा रहा है। "हम घर में 5-10 वाट के चंद बल्ब जलाते हैं, लेकिन बिल ऐसे आ रहे हैं जैसे हम कोई बड़ी फैक्ट्री चला रहे हों। न विभाग के अधिकारी जांच करते हैं और न ही मीटर लगाए जा रहे हैं।" — स्थानीय ग्रामीण

मौन है सत्तापक्ष, बेबस नजर आ रहा विपक्ष

इस संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठ रहा है। रीवा और मऊगंज के न तो विधायक और न ही सांसद इस विषय पर जनता का पक्ष ले रहे हैं। वहीं, विपक्ष में बैठी कांग्रेस पर भी आरोप लग रहे हैं कि वह अपनी ही पूर्ववर्ती सरकार की उपलब्धियों (सस्ती बिजली) को ढाल बनाकर आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही है। चर्चा है कि कई नेता केवल अपनी 'काली कमाई' बचाने और राजनैतिक रसूख बनाए रखने के लिए चुप्पी साधे हुए हैं।

बस्तियों में अवैध खपत और ट्रांसफार्मर का बोझ

शिकायत है कि विद्युत मंडल के अधिकारी ट्रांसफार्मर पर होने वाली कुल खपत का अनुमान लगाकर, उसे चंद कनेक्शन धारियों के मत्थे मढ़ रहे हैं। बस्तियों में चल रही अवैध बिजली की कोई सुध नहीं ले रहा, जबकि सरकारी योजनाओं (प्रधानमंत्री आवास, लाड़ली बहना) का लाभ लेने वाले गरीब परिवारों पर बिजली बिल का यह आर्थिक बोझ असहनीय होता जा रहा है। ग्रामीण अंचलों में 'आहा' भरती जनता अब उन वादों और नारों का हिसाब खोज रही है, जिनके नाम पर वोट लिए गए थे। यदि जल्द ही बिजली बिलों में सुधार और विसंगतियों को दूर नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post