| यूपी में एनकाउंटर, एमपी में 'एंट्री फीस'; मऊगंज और रीवा के रास्ते कैसे फल-फूल रहा है गो-तस्करी का काला साम्राज्य? Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश की सरहद पार करते ही उत्तर प्रदेश पुलिस की गोलियां गरजने लगती हैं, तस्कर दबोचे जाते हैं और गोवंश मुक्त कराए जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि वही तस्कर मध्य प्रदेश के रीवा, सीधी और मऊगंज जिलों की सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर का सफर सीना तानकर तय करते हैं। आखिर ऐसा क्या है कि जो ट्रक एमपी पुलिस को नजर नहीं आते, उन्हें यूपी पुलिस बॉर्डर पार करते ही 'मुठभेड़' में पकड़ लेती है? क्या यह केवल खुफिया तंत्र की विफलता है, या फिर सरहद पर 'मिलीभगत की कोई बड़ी डील' चल रही है?
मिर्जापुर कांड: मौत का ट्रक और रीवा कनेक्शन
हाल ही में मिर्जापुर (यूपी) के ड्रमंडगंज थाना क्षेत्र में एक दर्दनाक हादसा हुआ। 34 गोवंशों से भरा एक ट्रक अनियंत्रित होकर पलट गया, जिसमें 14 बेजुबानों की मौके पर ही मौत हो गई। इस हादसे ने तस्करी के उस जाल को उजागर किया जिसकी जड़ें रीवा में गहरी जमी हैं। गिरफ्तार खलासी मनोज सिंह (निवासी पटेहरा बैकुंठपुर, रीवा) ने कबूला कि गोवंशों की यह खेप रीवा के तलड़ी क्षेत्र की बरहदा घाटी से पंकज तिवारी नामक व्यक्ति ने लोड करवाई थी। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि रीवा जिला अब गो-तस्करी का 'लोडिंग पॉइंट' बन चुका है।
₹1000 की 'एंट्री फीस' और खाकी पर दाग
तस्करी के इस खेल में सबसे सनसनीखेज खुलासा एक पिकअप चालक ने किया है। हनुमना पुलिस ने जब 7 गोवंशों के साथ एक पिकअप पकड़ी, तो चालक ने पुलिस के सामने ही विस्फोटक दावा कर दिया। चालक के मुताबिक, हनुमना बॉर्डर पार करने के लिए पुलिस के नाम पर प्रति ट्रिप ₹1000 की 'एंट्री फीस' वसूली जाती है। यदि यह दावा सच है, तो यह साफ करता है कि क्यों चाकघाट और हनुमना जैसे संवेदनशील बॉर्डर्स से मौत की ये गाड़ियां बिना किसी रोक-टोक के गुजर जाती हैं। सवाल यह है कि यह 'वसूली' की रकम ऊपर तक कहाँ-कहाँ पहुँचती है?
सिंडिकेट के चेहरे: रेकी से लेकर फर्जी पहचान तक
सूत्रों की मानें तो इस पूरे अवैध कारोबार को एक संगठित गिरोह (सिंडिकेट) चला रहा है। इस गिरोह के हर किरदार का काम बंटा हुआ है:
राजा खान (हनुमना): इसका मुख्य काम पुलिस और प्रशासनिक गतिविधियों की रेकी करना है। यह गिरोह की 'आंख और कान' है।
शमशेर खान (बिहार निवासी): यह बिहार और यूपी के बाजारों से तालमेल बिठाता है और तस्करी के लिए सुरक्षित गाड़ियों और फर्जी पहचान पत्रों का इंतजाम करता है।
लल्लू यादव, बब्बू बख्श और बब्बू खान: ये इस सिंडिकेट के 'लोकेशन मास्टर' हैं। ये तस्करों को हर मिनट की लोकेशन देते हैं कि किस रास्ते पर पुलिस है और कहाँ से रास्ता साफ है।
सोनू (चकदही): खटकरी चौकी क्षेत्र का यह निवासी फिलहाल यूपी पुलिस की हिरासत में है। बताया जा रहा है कि सोनू इस पूरे रैकेट का सबसे बड़ा 'फ्रंटमैन' रहा है और उससे पूछताछ में कई सफेदपोशों के नाम सामने आ सकते हैं।
यूपी पुलिस की सक्रियता बनाम एमपी पुलिस की 'खामोशी'
मिर्जापुर के लालगंज में हुई मुठभेड़ के दौरान यूपी पुलिस ने तस्कर सोनू बिंद और मिथिलेश कुमार को गिरफ्तार किया। यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली दिखाती है कि वे अपराधियों को पकड़ने के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसके विपरीत, एमपी के मऊगंज और सीधी जिलों में ये गाड़ियां मुख्य मार्गों से गुजरती हैं, टोल नाकों को पार करती हैं, लेकिन स्थानीय पुलिस को 'भनक' तक नहीं लगती। क्या एमपी की पुलिस यूपी पुलिस की तुलना में तकनीकी रूप से पिछड़ी है, या फिर जानबूझकर 'आंखें मूंद' ली गई हैं?
महकमे के भीतर खलबली: डायल-112 के कर्मी से पूछताछ
हनुमना थाने के डायल-112 के कर्मचारी रामलोचन यादव से पांच दिनों तक चली गहन पूछताछ ने विभाग के भीतर हड़कंप मचा दिया है। चर्चा है कि तस्करी के इस विशाल साम्राज्य को बिना निचले स्तर के पुलिसकर्मियों और 'मुखबिर तंत्र' के सहयोग के नहीं चलाया जा सकता। जब रक्षक ही भक्षक के मददगार बन जाएं, तो फिर सरहदों की सुरक्षा पर सवाल उठना लाजमी है।
गंभीर सवाल जो जवाब मांगते हैं:
संरक्षण किसका? आखिर किसके राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण में ये तस्कर बेखौफ होकर बॉर्डर पार करते हैं?
दावा या हकीकत? क्या पिकअप चालक द्वारा लगाया गया ₹1000 की एंट्री फीस का आरोप सही है? यदि नहीं, तो पुलिस इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं करवाती?
मास्टरमाइंड कौन? सोनू और राजा खान जैसे लोग तो मोहरे हो सकते हैं, लेकिन इस करोड़ों के काले कारोबार का असली 'शतरंज का खिलाड़ी' कौन है?
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बावजूद गो-तस्करी का यह खेल बदस्तूर जारी है। मिर्जापुर और ड्रमंडगंज की घटनाएं केवल एक चेतावनी हैं। यदि मऊगंज और रीवा के बॉर्डर्स पर तैनात 'खाकी' ने ईमानदारी से अपना फर्ज नहीं निभाया, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्य प्रदेश की छवि 'तस्करों के सुरक्षित गलियारे' के रूप में बन जाएगी। जनता अब कार्रवाई चाहती है, केवल 'कागजी FIR' नहीं।