एमपी के 1 लाख कर्मचारियों पर संकट! वेतन कटौती मामले में सुप्रीम कोर्ट जा सकती है सरकार Aajtak24 News

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भोपाल - मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए आने वाले समय में बड़ा झटका लग सकता है। राज्य सरकार प्रोबेशन पीरियड में वेतन कटौती से जुड़े मामले में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है। यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करती है तो करीब एक लाख कर्मचारियों को मिलने वाला लगभग 400 करोड़ रुपये का एरियर फिलहाल अटक सकता है। दरअसल, यह मामला साल 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री Kamal Nath की सरकार द्वारा लागू किए गए नए नियम से जुड़ा है। उस समय राज्य सरकार ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिए प्रोबेशन पीरियड की अवधि 2 साल से बढ़ाकर 4 साल कर दी थी। साथ ही वेतन देने के तरीके में भी बदलाव किया गया था।

नए नियम के तहत कर्मचारियों को पहले साल में मूल वेतन का 70 प्रतिशत, दूसरे साल में 80 प्रतिशत, तीसरे साल में 90 प्रतिशत और चौथे साल में 100 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान किया गया था। यानी चार साल तक कर्मचारियों को पूरा वेतन नहीं मिलता था और उन्हें स्टाइपेंड के रूप में कम भुगतान किया जाता था। इसके अलावा यह भी तय किया गया था कि जब तक प्रोबेशन पीरियड पूरा नहीं होगा, तब तक उन्हें नियमित कर्मचारियों की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस फैसले के खिलाफ कर्मचारी संगठनों ने Madhya Pradesh High Court में याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोत की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार के इस नियम को भेदभावपूर्ण बताया। अदालत ने कहा कि जब कर्मचारियों से पूरा काम लिया जा रहा है तो उन्हें पूरा वेतन भी दिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कम वेतन देना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जिन कर्मचारियों की सैलरी प्रोबेशन पीरियड में कम दी गई है, उन्हें एरियर के साथ पूरा भुगतान किया जाए। लेकिन अब राज्य सरकार इस फैसले से सहमत नहीं है और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। सरकार का तर्क है कि कर्मचारी चयन मंडल और Madhya Pradesh Public Service Commission की भर्ती प्रक्रिया अलग-अलग है। एमपीपीएससी में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू जैसी कई चरणों की चयन प्रक्रिया होती है, जबकि कर्मचारी चयन मंडल में केवल एक परीक्षा के आधार पर चयन किया जाता है। इसलिए दोनों में नियम अलग हो सकते हैं।

इसी बीच प्रदेश के कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते (डीए) को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। राज्य सरकार ने हाल ही में 3 प्रतिशत महंगाई भत्ता बढ़ाने की घोषणा की है, जिससे सातवें वेतनमान के तहत कर्मचारियों को अब कुल 58 प्रतिशत डीए मिलेगा। हालांकि वित्त विभाग की योजना के अनुसार यह दर वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक 64 प्रतिशत तक पहुंचनी थी। प्रदेश में करीब 7.5 लाख नियमित कर्मचारी और लगभग 4.5 लाख पेंशनर्स महंगाई भत्ता और महंगाई राहत के दायरे में आते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि राज्य सरकार अपने तय लक्ष्य से करीब 6 प्रतिशत पीछे चल रही है और केंद्र के फैसले के बाद तुरंत लाभ दिया जाना चाहिए। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में कब याचिका दायर करती है और वहां से क्या फैसला आता है। क्योंकि उसी के आधार पर करीब एक लाख कर्मचारियों के 400 करोड़ रुपये के एरियर का भविष्य तय होगा।

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