फाइलों में सिमटा विकास, कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रहा गांधीजी का ‘ग्राम स्वराज’ Aajtak24 News

फाइलों में सिमटा विकास, कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रहा गांधीजी का ‘ग्राम स्वराज’ Aajtak24 News

रीवा - राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' का सपना देखा था ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और गांवों का विकास जमीनी स्तर पर हो सके। लेकिन वर्तमान में रीवा और नवगठित मऊगंज जिले की ग्राम पंचायतों से जो जमीनी हकीकत सामने आ रही है, वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासन के लिए गहरी चिंता का विषय है।

कमीशन का गणित: ₹100 में से सिर्फ ₹30 का काम

सूत्रों और नाम न छापने की शर्त पर कई सरपंचों ने जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है। विकासमूलक योजनाओं में भ्रष्टाचार का जाल इतना गहरा है कि अगर सरकार ₹100 भेजती है, तो धरातल पर मात्र ₹30 का ही कार्य हो पाता है। शेष ₹70 सिस्टम की भेंट चढ़ जाते हैं।

भ्रष्टाचार की 'रेट लिस्ट':

सरपंचों के अनुसार, विकास कार्यों की राशि का बंदरबांट कुछ इस प्रकार होता है:

जनप्रतिनिधि (कमीशन): 20% से 25%

उपयंत्री (इंजीनियर): 10%

सचिव/पंचायत तंत्र: 15%

एसडीओ/अन्य अधिकारी: 2% से 3%

सोशल ऑडिट व अन्य खर्च: 3% से 5%

इसके अलावा, 10-15% राशि श्रमिकों के नाम पर डाली गई उन फर्जी एंट्रियों में डूब जाती है, जिनका लाभ असली मजदूरों को कभी मिलता ही नहीं।

मजदूरी की दर और व्यावहारिक संकट

एक तरफ सरकारी रिकॉर्ड में अकुशल मजदूर की दर लगभग ₹246 है, वहीं बाजार में वर्तमान स्थिति यह है कि अकुशल मजदूर भी ₹400 से ₹500 से कम पर उपलब्ध नहीं है। कुशल कारीगर (मिस्त्री) ₹600 प्रति दिन की मांग कर रहे हैं। सरकारी रेट और बाजार रेट के इसी अंतर के कारण सरपंच अब विकासमूलक कार्यों (जैसे सड़क, नाली, भवन निर्माण) से तौबा कर रहे हैं और केवल हितग्राही मूलक कार्यों को ही सुरक्षित मान रहे हैं।

अभिलेखों में 'चमकते' गांव, धरातल पर 'अंधेरा'

रीवा और मऊगंज जिले की कई पंचायतों में कागजों पर तो करोड़ों-अरबों की योजनाएं पूर्ण दिखाई गई हैं, लेकिन जब धरातल पर वास्तविकता जांची जाती है, तो वहां काम नाममात्र का मिलता है। भ्रष्टाचार की यह चर्चा अब आम जनमानस में भी होने लगी है कि वर्तमान व्यवस्था में पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

सरपंचों का छलकता दर्द

कई सरपंचों का कहना है कि "अब विकास कार्य करने का मन नहीं करता। हर कदम पर कमीशन और ऊपर से मजदूरों की कमी ने काम को असंभव बना दिया है। हम केवल एक 'रबर स्टैंप' बनकर रह गए हैं। यदि समय रहते रीवा और मऊगंज प्रशासन ने इस 'कमीशन तंत्र' पर लगाम नहीं लगाई, तो पंचायतों को मिलने वाला बजट केवल भ्रष्टाचार की खेती को सींचने के काम आएगा और ग्रामीण विकास का सपना केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएगा।

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