आधी आबादी का पूरा हक आखिर कब? सिवनी में 'ममता' की छांव तले क्यों तरस रही हैं समूह की महिलाएं! Aajtak24 News

मुख्यमंत्री के सपनों पर अधिकारियों की सुस्ती का साया; 4 माह से रुका स्व-सहायता समूहों का भुगतान, कर्ज के बोझ तले दबीं 'पोषण' देने वाली माताएं

सिवनी - मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एक ओर प्रदेश की महिलाओं को 'लाडली बहना' और 'लखपति दीदी' बनाकर सशक्त करने का सपना देख रहे हैं, वहीं सिवनी जिले में प्रशासनिक उदासीनता के चलते इन सपनों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। मामला जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़ा है, जहाँ आंगनबाड़ियों में बच्चों और माताओं को गर्म भोजन परोसने वाली स्व-सहायता समूह की महिलाएं पिछले चार-पांच महीनों से अपने जायज भुगतान के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।

कर्ज की चक्की में पिसती 'पोषण' की वाहक

सिवनी जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित आंगनबाड़ियों में भोजन व्यवस्था का जिम्मा गरीब वर्ग की महिलाओं के समूहों के पास है। ये महिलाएं खुद गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती हैं, लेकिन पिछले 4 महीनों से भुगतान न होने के कारण अब इनका चूल्हा जलना भी मुश्किल हो गया है। समूहों की महिलाओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे किराना दुकानदार, सब्जी वाले, आटा चक्की और ऑटो वालों के कर्ज में डूबी हुई हैं। स्थिति यह है कि उधारी मांगते-मांगते अब बाजार में भी उन्हें सामान मिलना बंद हो गया है।

अधिकारी बदले, बदल गई व्यवस्था!

चर्चाओं का बाजार गर्म है कि पूर्व जिला कार्यक्रम अधिकारी अभिजीत पचौरी के समय भुगतान की प्रक्रिया सुचारू और समयबद्ध थी। लेकिन, नई जिला कार्यक्रम अधिकारी के पदभार संभालते ही व्यवस्थाएं पटरी से उतर गई हैं। आरोप है कि यदि कोई समूह भुगतान की मांग करता है या शिकायत करने की हिम्मत जुटाता है, तो उसे 'टेंडर रद्द करने' की धमकी देकर चुप करा दिया जाता है। प्रशासन का यह रवैया 'नारी शक्ति' के सम्मान पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

महिला नेतृत्व के बावजूद क्यों है निराशा?

जिले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस समय जिले की प्रशासनिक कमान एक महिला कलेक्टर के हाथों में है। इसके साथ ही, जिले की सांसद और भाजपा की जिला अध्यक्ष भी महिलाएं हैं। इसके बावजूद, महिला बाल विकास विभाग के अंतर्गत काम करने वाली इन गरीब महिलाओं का शोषण होना समझ से परे है। क्या एक महिला अधिकारी और जनप्रतिनिधि, इन संघर्षशील महिलाओं का दर्द नहीं समझ पा रही हैं?

सकारात्मक हस्तक्षेप की दरकार

यह खबर केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए एक वेक-अप कॉल (Wake-up Call) है। जिला प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करे और रुकी हुई राशि का भुगतान सुनिश्चित करे। यदि समय रहते इन समूहों का मानदेय और लागत राशि जारी कर दी जाती है, तो न केवल इन महिलाओं का आत्मविश्वास लौटेगा, बल्कि 'मिशन शक्ति' के उद्देश्य भी सफल होंगे। अब देखना यह है कि जिले की 'शक्ति' (महिला नेतृत्व) इन गरीब बहनों के आंसुओं को पोंछने के लिए आगे आती है या फिर फाइलों के फेर में इन महिलाओं का हक ऐसे ही दबा रहेगा? शासन की मंशा स्पष्ट है, बस जिले के अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली में 'संवेदनशीलता' लाने की जरूरत है।


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