योजनाओं की चमक के पीछे भ्रष्टाचार का अंधेरा, रीवा में विकास के दावों की खुली पोल Aajtak24 News

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रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश के रीवा और नवनिर्मित मऊगंज जिले में आज 'विकास' और 'विनाश' के बीच की लकीर धुंधली पड़ती जा रही है। एक ओर सरकारी विज्ञापनों में योजनाओं का अंबार है, तो दूसरी ओर धरातल पर भ्रष्टाचार का 'दीमक' पूरे सिस्टम को चाट रहा है।

किसानों और गरीबों का शोषण: सरकार यूरिया की दर ₹267 तय करती है, लेकिन रीवा के बाजारों में यह ₹600 तक पहुँच चुकी है। यह कालाबाजारी प्रशासन की नाक के नीचे हो रही है। बिजली विभाग का 'बिल करंट' और ट्रांसफार्मर बदलने के लिए 'सिफारिशी संस्कृति' ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपंग बना दिया है।

स्वास्थ्य और शिक्षा का व्यापार: सरकारी अस्पतालों का निजी क्लीनिकों के साथ 'अघोषित गठबंधन' गरीबों की जान का दुश्मन बन गया है। शिक्षा विभाग में पुताई और मरम्मत के नाम पर होने वाला भ्रष्टाचार भविष्य की पीढ़ी के साथ खिलवाड़ है।

माफिया तंत्र का दुस्साहस: खनिज, शराब और पशु तस्करी के काले कारोबार ने यह सिद्ध कर दिया है कि यहाँ कानून का राज नहीं, बल्कि माफिया का 'समानांतर प्रशासन' चल रहा है। परिवहन विभाग की लापरवाही सड़कों को 'रक्त रंजित' कर रही है, लेकिन आरटीओ कार्यालय केवल वसूली का केंद्र बनकर रह गया है। यदि योजनाओं का लाभ अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक नहीं पहुँच रहा और भ्रष्टाचार की फाइलें दफ्तरों में धूल फांक रही हैं, तो यह विकास नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ धोखा है। जिला प्रशासन और जन प्रतिनिधियों को अपनी संवेदनशीलता लौटानी होगी, वरना कागजी 'रामराज्य' और जमीनी 'लूट' का यह अंतर आने वाले समय में एक बड़े जन-आक्रोश को जन्म देगा।

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