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| बैंक की चौखट पर ठहरा पंचायत का अधिकार, यूनियन बैंक सिरमौर में कलर्क की मनमानी Aajatak24 News |
रीवा जिले की लीड बैंक यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, शाखा सिरमौर से उपजा यह घटनाक्रम किसी एक पंचायत सचिव के साथ हुई अभद्रता मात्र नहीं है, बल्कि यह पंचायती राज व्यवस्था, प्रशासनिक मर्यादा और वित्तीय पारदर्शिता- तीनों पर एक साथ किया गया प्रहार है। ग्राम पंचायत पल्हान के सचिव रमाकांत तिवारी को पंचायत खाते की पासबुक एवं आवक- जावक की स्टेटमेंट देने से इनकार कर देना उस समय और भी गंभीर हो जाता है, जब ग्राम विकास के तमाम कार्य इन्हीं अभिलेखों पर आश्रित हैं। बैंक कलर्क जेपी पटेल द्वारा न केवल जानकारी देने से इंकार किया गया, बल्कि सचिव के साथ अशोभनीय एवं अपमानजनक व्यवहार करते हुए लिखित रूप में यह दर्ज कर दिया गया कि सरपंच की अनुपस्थिति में पंचायत खाते से संबंधित कोई जानकारी सचिव को नहीं दी जाएगी। यह कथन केवल बैंकिंग समझ की दरिद्रता नहीं दर्शाता, बल्कि कानून, प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था की खुली अवहेलना का दस्तावेज़ बन गया है।
मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम स्पष्ट रूप से यह परिभाषित करता है कि पंचायत सचिव एक वैधानिक प्रशासनिक कर्मचारी है, जिस पर पंचायत के अभिलेख, लेखा- जोखा, वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता की जिम्मेदारी निहित होती है। यह निर्विवाद तथ्य है कि पंचायत खाते से धन- निकासी सरपंच और सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से होती है, किंतु खाता विवरण, पासबुक, स्टेटमेंट, ऑडिट और सत्यापन की जानकारी प्राप्त करना सचिव का संवैधानिक अधिकार और प्रशासनिक कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के स्पष्ट बैंकिंग दिशानिर्देशों के अनुसार संस्थागत खातों में अधिकृत पदाधिकारियों को खाता- संबंधी सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में पंचायत सचिव को जानकारी से वंचित करना न केवल सूचना के अधिकार, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
स्थानीय हितग्राहियों का आरोप है कि संबंधित कलर्क द्वारा आम नागरिकों के साथ भी आए दिन अमर्यादित व्यवहार किया जाता है और कथित राजनीतिक संबंधों का हवाला देकर धौंस जमाई जाती है। यदि ये आरोप सत्य हैं, तो यह बैंकिंग सेवा नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार का काउंटर-प्रदर्शन है- जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्वीकार्य और निंदनीय है। पंचायत खाते की पुरानी स्टेटमेंट न मिलने से ग्राम पंचायत के कई महत्वपूर्ण विकास कार्य ठप पड़े हैं। भुगतान, ऑडिट, योजनाओं की प्रगति और जवाबदेही- सब कुछ बैंक की एक मनमानी के कारण अवरुद्ध है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जब संस्थागत अहंकार जनहित से बड़ा हो जाए, तो विकास केवल प्रस्तावों और फाइलों तक सिमट कर रह जाता है।
यह मामला किसी एक शाखा या एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यहाँ सवाल पूरे तंत्र से है- क्या बैंक कर्मचारी पंचायत जैसे संवैधानिक निकाय से ऊपर हैं? क्या एक प्रशासनिक कर्मचारी को अपमानित कर ग्राम विकास रोका जा सकता है? और क्या लीड बैंक होने का अर्थ जवाबदेही से मुक्त हो जाना है? अब यह अनिवार्य हो गया है कि जिला प्रशासन, लीड बैंक प्रबंधन एवं बैंक का क्षेत्रीय कार्यालय इस प्रकरण का संज्ञान लें, दोषी आचरण पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करें और यह स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करें कि पंचायत सचिवों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा। क्योंकि जब पंचायत का अधिकार बैंक काउंटर पर ठहर जाए, तो यह केवल एक सचिव का अपमान नहीं होता- यह लोकतंत्र की जड़ों पर चोट होती है।
