धान खरीदी का 'महाघोटाला': रीवा-मऊगंज में किसानों के हक पर बिचौलियों का डाका, यूपी की धान खपाने का खेल बेनकाब Aajtak24 News

धान खरीदी का 'महाघोटाला': रीवा-मऊगंज में किसानों के हक पर बिचौलियों का डाका, यूपी की धान खपाने का खेल बेनकाब Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के रीवा और मऊगंज जिलों में धान खरीदी का कार्य अपने अंतिम चरण में है। एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि अन्नदाता की आय दोगुनी करने के लिए पारदर्शिता के साथ अनाज खरीदा जा रहा है, वहीं धरातल पर बिचौलियों, व्यापारियों और भ्रष्ट अधिकारियों का एक ऐसा सिंडिकेट काम कर रहा है जिसने वास्तविक किसानों को हाशिए पर धकेल दिया है।

बिचौलियों का बोलबाला और यूपी की धान का अवैध आयात

रीवा और मऊगंज जिले की भौगोलिक स्थिति उत्तर प्रदेश की सीमा से लगी होने के कारण यहाँ 'सीमा पार व्यापार' का एक अवैध तंत्र विकसित हो गया है। सूत्रों और जनचर्चा के अनुसार, बिचौलिए उत्तर प्रदेश के किसानों से औने-पौने दामों पर घटिया और औसत दर्जे की धान खरीदते हैं। इस धान को ट्रकों के जरिए मप्र लाया जाता है और यहाँ के किसानों के फर्जी पंजीयन या 'सेटिंग' वाले पंजीयन पर समर्थन मूल्य (MSP) पर बेच दिया जाता है। इस खेल में व्यापारियों को प्रति क्विंटल 500 से 700 रुपये का सीधा मुनाफा हो रहा है, जिसका एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर कमीशन के रूप में तंत्र में बंट रहा है।

गोदामों में गुणवत्ता और सर्वेयर की 'डील'

भ्रष्टाचार की अगली कड़ी गोदामों और भंडारण केंद्रों पर शुरू होती है। यहाँ नियुक्त 'सर्वेयर' की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध है। नियमों के मुताबिक धान की गुणवत्ता की सख्त जांच होनी चाहिए, लेकिन आरोप है कि 'सुविधा शुल्क' के बदले व्यापारियों की खराब और नमी वाली धान को भी 'ए ग्रेड' घोषित कर भंडारण कर दिया जाता है। यदि इन गोदामों में रखे गए स्टॉक की उच्च स्तरीय लैब जांच कराई जाए, तो अरबों के इस खेल की परतें उधड़ सकती हैं।

तौल में धांधली और किसानों का शोषण

खरीदी केंद्रों पर दो अलग-अलग कानून चल रहे हैं। आम किसान जब अपनी उपज लेकर पहुंचता है, तो उसे बारदाने की कमी, तौल में देरी और गुणवत्ता का हवाला देकर परेशान किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, व्यापारियों की धान से लदे ट्रैक्टरों को प्राथमिकता दी जाती है। केंद्रों पर व्यापारियों की धान प्रति बोरी 40 किलो के सटीक माप के साथ धड़ल्ले से तौली जा रही है। हैरानी की बात यह है कि व्यापारियों के माल की तौल के लिए मजदूर और मशीनें हमेशा उपलब्ध रहती हैं, जबकि किसान घंटों अपनी बारी का इंतजार करता रहता है।

समितियों के छोटे कर्मचारियों का 'अजीब' रसूख

रीवा और मऊगंज में समितियों के सहायक और विक्रेता जैसे छोटे कर्मचारियों की जीवनशैली किसी रहस्य से कम नहीं है। ये कर्मचारी मूल नियुक्ति वाले केंद्रों पर कभी दिखाई नहीं देते। इनकी सक्रियता अक्सर बैंकों, गोदाम प्रबंधकों के केबिनों और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के इर्द-गिर्द देखी जाती है। यह चर्चा आम है कि ये कर्मचारी ही व्यापारियों और अधिकारियों के बीच 'सेतु' का काम करते हैं। इनके आलीशान रहन-सहन और प्रशासनिक पकड़ को देखकर क्षेत्र की जनता भी इनके रसूख से भयभीत रहती है।

95% खरीदी के बाद अब 'कोटे' का शिकार

आंकड़ों के अनुसार, लगभग 95% खरीदी का लक्ष्य पूरा हो चुका है। अब शेष बचे 5% कोटे पर बिचौलियों की गिद्ध दृष्टि जमी है। छोटे किसानों के बचे हुए रकबे और पंजीयन को कौड़ियों के दाम खरीदकर उस पर व्यापारियों का माल खपाया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि यह पूरा प्रकरण पिछली बार की तुलना में भी बड़ा घोटाला साबित हो सकता है। पिछली जांचों का क्या हुआ, यह आज भी एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

प्रशासनिक खामोशी और भविष्य की जांच

इस पूरे प्रकरण पर जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी 'मौन स्वीकृति' का आभास देती है। शिकायतों के बावजूद औचक निरीक्षण और कार्रवाई न होना व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। जनता में भारी आक्रोश है कि उनकी मेहनत का पैसा बिचौलियों की जेब में जा रहा है। यह स्पष्ट है कि यदि समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो सरकारी खजाने को भारी चपत लग चुकी होगी और जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगी।


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