मऊगंज 2025: विकास के दावों के बीच अपराध और हादसों का 'ब्लैक बॉक्स', जिसने हिला दी जिले की बुनियाद Aajtak24 News

मऊगंज 2025: विकास के दावों के बीच अपराध और हादसों का 'ब्लैक बॉक्स', जिसने हिला दी जिले की बुनियाद Aajtak24 News

मऊगंज  - किसी भी नए जिले के लिए शुरुआती साल उसकी पहचान और विकास की इबारत लिखने के होते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश का नवगठित जिला मऊगंज वर्ष 2025 को एक 'स्याह याद' के रूप में विदा कर रहा है। बीता हुआ यह साल मऊगंज के लिए खुशहाली के बजाय चीखों, अपनों को खोने के दर्द और प्रशासनिक विफलता की कहानियों से भरा रहा। वर्ष 2025 में मऊगंज ने वह सब कुछ देखा जिसने समाज के सौहार्द्र को तार-तार किया और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं। गड़रा कांड की भयावह हिंसा से लेकर एक मासूम की सिस्टम द्वारा 'हत्या' तक, यह साल मऊगंज के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा।

गड़रा कांड: जब भीड़तंत्र ने कानून का गला घोंटा

साल 2025 की सबसे वीभत्स घटना 15 मार्च को दर्ज हुई, जिसे 'गड़रा कांड' के नाम से जाना गया। होली का पर्व, जो भाईचारे का प्रतीक है, वह मऊगंज के गड़रा गांव में खून की होली में बदल गया। एक मामूली विवाद के बाद आदिवासी समुदाय की उग्र भीड़ ने सनी द्विवेदी नामक युवक को उसके घर में ही बंधक बना लिया। भीड़ का उन्माद इतना बढ़ा कि युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया। हैरानी की बात यह थी कि जब पुलिस टीम बीच-बचाव करने पहुंची, तो उपद्रवियों ने कानून का खौफ छोड़कर पुलिस पर ही धावा बोल दिया। लाठी-डंडों और पत्थरों की बारिश के बीच एएसआई रामचरण गौतम शहीद हो गए और कई अन्य पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। इस घटना ने साबित कर दिया कि मऊगंज के दूरदराज इलाकों में पुलिस का इकबाल खत्म हो चुका है। परिणाम स्वरूप, जिले के कलेक्टर और एसपी को रातों-रात हटाना पड़ा और पूरे जिले को छावनी में तब्दील करना पड़ा। यह घटना सामाजिक विद्वेष और प्रशासनिक ढिलाई का सबसे बड़ा उदाहरण बनी।

साइबर टेरर: एक शिक्षिका की 'डिजिटल हत्या'

मऊगंज ने इस साल डिजिटल अपराध का वह क्रूर चेहरा भी देखा जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया। 6 जनवरी 2025 को शासकीय शिक्षिका रेशमा पांडे साइबर ठगों के 'डिजिटल अरेस्ट' और मानसिक प्रताड़ना का शिकार हुईं। ठगों ने खुद को जांच एजेंसी का बड़ा अधिकारी बताकर उन्हें इतना डराया कि लोक-लाज और जेल जाने के भय से उन्होंने जहर खा लिया। 7 जनवरी को अस्पताल में उनकी मौत ने यह सवाल खड़ा किया कि साइबर सेल आखिर क्या कर रहा है? एक पढ़ी-लिखी शिक्षिका का इस तरह टूटना जिले में जागरूकता और साइबर सुरक्षा की पोल खोल गया।

रक्त रंजित सड़कों पर उजड़ते सुहाग और बिखरते परिवार

सड़क सुरक्षा के मामले में भी 2025 मऊगंज के लिए बेहद घातक रहा। सोहागी पहाड़ और आसपास के क्षेत्रों में ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार ने कई मासूमों की बलि ली। साल के मध्य में एक ऑटो के पलटने से एक ही परिवार के कई सदस्यों की मौत ने पूरे जिले को रुला दिया। वहीं, साल के अंत में जब पूरा देश उत्सव की तैयारी में था, अयोध्या दर्शन के लिए जा रहे एक श्रद्धालु परिवार का वाहन ट्रैक्टर-ट्रॉली से टकरा गया। तीन श्रद्धालुओं की मौके पर मौत ने प्रशासन के यातायात प्रबंधन के दावों को झूठा साबित कर दिया। सड़कों पर दौड़ते यमदूत नुमा वाहन और उन पर अंकुश लगाने में नाकामयाब परिवहन विभाग इस साल पूरी तरह कठघरे में रहा।

स्वास्थ्य का 'बीमार' सिस्टम और पांच महीने का मासूम

अगर कानून और सड़कें असुरक्षित थीं, तो स्वास्थ्य सेवाओं का हाल और भी बदतर रहा। हनुमना क्षेत्र के खटखरी में पांच महीने के मासूम दुर्गेश यादव की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर से दी गई एक गलत दवा ने आधे घंटे के भीतर एक मां की गोद सूनी कर दी। यह घटना तब हुई जब शासन स्तर पर मेडिकल स्टोरों की नियमित जांच के निर्देश थे। मासूम दुर्गेश की मौत केवल एक लापरवाही नहीं, बल्कि उस 'मेडिकल माफिया' और प्रशासनिक सुस्ती का नतीजा थी जो गांवों में खुलेआम लोगों की जान से खेल रहे हैं।

सिस्टम फेलियर या केवल इत्तेफाक?

इन तमाम घटनाओं का विश्लेषण करें तो एक बात साफ नजर आती है—मऊगंज का प्रशासनिक ढांचा इस साल पूरी तरह चरमराया हुआ रहा। गड़रा कांड में खुफिया तंत्र की विफलता, साइबर ठगी में पुलिस की सुस्ती, सड़कों पर बेलगाम वाहन और स्वास्थ्य के नाम पर खिलवाड़, ये सब अलग-अलग घटनाएं नहीं बल्कि एक ही सिक्के के कई पहलू हैं। अधिकारियों के तबादले हुए, नई नियुक्तियां हुईं, लेकिन आम आदमी के लिए सुरक्षा और सुविधा आज भी कोसों दूर है।

निष्कर्ष: 2026 से उम्मीदें और चुनौतियां

वर्ष 2025 मऊगंज के लिए घावों का साल रहा है। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल जिला बना देने से विकास नहीं आता, विकास के लिए एक जवाबदेह प्रशासन और सुरक्षित समाज की जरूरत होती है। गड़रा की आग, रेशमा की मजबूरी और दुर्गेश की मासूमियत आज भी मऊगंज की हवाओं में सवाल बनकर तैर रही है। अब देखना यह होगा कि क्या 2026 में मऊगंज का प्रशासन इन गलतियों से सबक लेगा? क्या थानों में जनता की सुनवाई होगी? क्या सड़कों पर यातायात नियमों का पालन होगा? और क्या स्वास्थ्य सेवाएं किसी मासूम की जान बचाने के काबिल बन पाएंगी? मऊगंज की जनता अब आश्वासनों से ऊब चुकी है, उसे ठोस कार्रवाई और सुरक्षित भविष्य की तलाश है।

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