अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ से हमेशा दूर रहे: मुनि पीयूषचन्द्रविजय | Ahankar krodh maan maya lobh se hamesha door rhe

अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ से हमेशा दूर रहे: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ से हमेशा दूर रहे: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

राजगढ़/धार (संतोष जैन) - 45 आगमों के अंतर्गत उत्तराध्ययन सूत्र में प्रभु की अंतिम देशना पर प्रवचन की श्रृंखला चल रही है । वचन अच्छे या खराब हो सकते है पर प्रवचन हमेशा आत्मा के कल्याणार्थ ही होते है । महापुरुषों के द्वारा प्रदत्त वाणी प्रवचन के रुप में सभी जीवों के लिये जीवन उपयोगी होकर हितकारी होती है । प्रभु महावीर ने बाह्य संसार में भटके हुऐ जीवों को कहा कि पुरुषार्थ से ही आत्मा का कल्याण सम्भव होगा । समवशरण में परमात्मा के वचन सभी जीवों को अपनी-अपनी भाषा में समझ में आते है । परमात्मा का एक वचन भी आत्मा को हिलाकर रख देता है । नरक में जाने के चार मुख्य द्वार है । सात नरक में जीव को अनन्त भुख, प्यास, भीषण गर्मी, दण्ड, अनन्त ज्वर, भय, अनन्त रोग, शोक, अनन्त खुजली और पराधीनता जैसी 10 महावेदना को सहन करके जीव 84 लाख जीवयोनियों में भटकते हुऐ मानव जीवन को प्राप्त करता है । ऐसे दुर्लभ मानव जीवन को हम यूं ही नष्ट कर रहे है । इसका सदुपयोग करने के लिये शास्त्रों में उल्लेखित नियमों को पालन करके हम आत्मा को कल्याण के मार्ग पर ले जा सकते है । 24 तीर्थंकरों ने 48 मिनिट की सामायिक में षट्काय के जीवों की रक्षा करते हुये 84 लाख जीवयोनियों के जीवों से क्षमायाचना सामायिक के माध्यम से करने का मार्ग दिखाया है । जीव के पास 12 भावनाऐं होती है । सभी जीवों की रक्षा करना हमारा परमधर्म एवं नैतिक कर्तव्य है । परमात्मा ने बोलने, खाने, सोने, चलने आदि में जयणा और विवेक रखने को कहा है । उक्त बात श्री राजेन्द्र भवन राजगढ़ में गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. ने कही । आपने कहा कि अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ ये कषाय बताये है जिससे हमेशा दूर रहना चाहिये । गौतमस्वामी का नाम इन्द्रभूति था और वे गौतम गौत्र के थे । गौतमस्वामीजी जैसा विनय और विवेक किसी और के पास नहीं था । गौतमस्वामी अनन्त लब्धि निधान है, उनका और प्रभु महावीर का अविरल प्रेम था । प्रभु ने इस राग को दूर करने के लिये गौतमस्वामीजी को अपने निर्वाण के समय जानकर उनको आज्ञा देकर देव शर्मा ब्राह्मण को प्रतिबोध करने हेतु अपने पास से दूर भेज दिया था ।

अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ से हमेशा दूर रहे: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

आज सोमवार से 4 अगस्त तक अट्ठम तप आराधना का आयोजन श्री मथुरालालजी प्यारचंदजी मोदी परिवार की ओर से रखा गया है । राजगढ़ श्रीसंघ में 14 अगस्त से नमस्कार महामंत्र की आराधना मुनिमण्डल एवं साध्वीवृंद की निश्रा में होगी ।


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