माया से पार पाना मुश्किल काम है, इसलिए संयम बड़ा ही जरूरी है। विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है - पण्डित अनुपानंद जी भागवताचार्य | Maya se paar pana mushkil kaam hai

माया से पार पाना मुश्किल काम है, इसलिए संयम बड़ा ही जरूरी है। विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है - पण्डित अनुपानंद जी भागवताचार्य

माया से पार पाना मुश्किल काम है, इसलिए संयम बड़ा ही जरूरी है। विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है - पण्डित अनुपानंद जी भागवताचार्य

झाबुआ (अली असगर बोहरा) - नगर की राठौर धर्मशाला में श्री पदमवंशीय राठौर तेली समाज द्वारा आयोजित भागवत कथा में भागवताचार्य पण्डित अनुपानंद के श्रीमुख से भागवत
कथा रसपान प्रवाहित हो रहा है । व्यास पीठ से पण्डित अनुपानंदजी ने कहा कि विष्णु पुराण के मुताबिक एक बार ऋषि दुर्वासा वैकुंठ लोक से आ रहे थे।
रास्ते में उन्होंने ऐरावत हाथी पर बैठे इन्द्र को त्रिलोकपति समझ कमल
फूल की माला भेंट की। किंतु वैभव में डूबे इन्द्र ने अहंकार में वह माला
ऐरावत के सिर पर फेंक दी। हाथी ने उस माला को पैरों तले कुचल दिया।
दुर्वासा ऋषि ने इसे स्वयं के साथ कमल फूलों पर बैठने वाली कमला यानी
लक्ष्मी का भी अपमान माना और इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप दिया।
पौराणिक मान्यता यह भी है कि इससे इन्द्र दरिद्र हो गया। उसका सारा वैभव
गिरकर समुद्र में समा गया। दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
पण्डित अनुपानंद जी ने बताया कि स्वर्ग का राज्य और वैभव फिर से पाने के
लिए भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन करने और उससे निकलने वाले अमृत को खुद
देवताओं को पिला अमर बनाने का रास्ता सुझाया। साथ ही कहा कि यह काम
दैत्यों को भी मनाकर ही करना संभव होगा। इन्द्रदेव ने इसी नीति के साथ
दैत्य राज बलि को समुद्र में समाए अद्भुत रत्नों व साधनों को पाने के लिए
समुद्र मंथन के लिए तैयार किया। देव-दानवों ने समुद्र मंथन के लिए
मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सा  जिसे नेति या सूत्र कहा
जाता है , बनाया। स्वयं भगवान ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल को डुबने से
बचाया। समुद्र मंथन के दौरान सबसे पहले मंदराचल व कच्छप की पीठ की रगड़ से
समुद्र में आग लगी और भयानक कालकूट जहर निकला। सभी देव-दानवों और जगत में
अफरा-तफरी मच गई। कालों के काल शिव ने इस विष को गले में उतारा और नीलकंठ
बने। समुद्र मंथन से अश्वजाति में श्रेष्ठ, चन्द्रमा की तरह सफेद व
चमकीला, मजबूत कद-काठी का दिव्य घोड़ा उच्चैरूश्रवा प्रकट हुआ, जो दैत्यों
के हिस्से गया और इसे दैत्यराज बलि ने ले लिया। समुद्र मंथन से निकली
साक्षात मातृशक्ति व महामाया महालक्ष्मी के तेज, सौंदर्य व रंग-रूप ने
सभी को आकर्षित किया। लक्ष्मीजी को मनाने के लिए सभी जतन करने लगे। किसे
अपनाएं यह सोच लक्ष्मीजी ऋषियों के पास गई, किंतु ज्ञानी व तपस्वी होने
पर भी क्रोधी होने से उन्हें नहीं चुना। इसी तरह देवताओं को महान होने पर
भी कामी, मार्कण्डेयजी को चिरायु होने पर भी तप में लीन रहने, परशुराम जी
को जितेन्द्रिय होने पर भी कठोर होने की वजह से नहीं चुना।
कथा सुनाते हुए अनुपानंद जी ने कहा कि आखिर में लक्ष्मीजी ने शांत,
सात्विक, सारी शक्तियों के स्वामी और कोमल हृदय होने से भगवान विष्णु को
वरमाला पहनाई। संदेश यही है कि जिनका मन साफ और सरल होता है उन पर
लक्ष्मी प्रसन्न होती है। भगवान विष्णु ने महादेव को मोहिनी रूप दिखाया।
महादेव ने देखा कि एक सुन्दर बगीचे में फूलों की गेंद से उछल-उछल कर
सुंदरी खेल रही हैं। गालों पर कुण्डल और घुंघराले बाल लटक रहे हैं, जिनको
खेलते वक्त वह अपने कोमल हाथों से हटा रही है। सारे जगत को मोहित करते
हुए अचानक तिरछी नजर से शिव की ओर देखती है। इस पर भगवान शिव उस पर मोहित
हो गए। कुछ समय बाद महादेव को याद आया कि यह तो भगवान की माया है।
उन्होंने फौरन आसक्ति से खुद को दूर किया । इस प्रसंग में शिव ने यही
संदेश दिया कि ज्ञानी को भी काम नहीं छोड़ता। माया से पार पाना मुश्किल
काम है, इसलिए संयम बड़ा ही जरूरी है। आरती के प्रसादी का वितरण किया गया
। आज श्रुक्रवार को कंसवध का प्रसंग सुनाया जावेगा ।

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