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| कलेक्टर साहब, रात में नहीं दिन में निजी नर्सिंग होमों का निरीक्षण करिए, सामने आएगी डॉक्टरों की असली ड्यूटी |
रीवा - कलेक्टर साहब रात में संजय गांधी अस्पताल का नहीं बल्कि दिन में रीवा शहर में कुकुरमुत्ते कि तरह संचालित प्राइवेट नर्सिंग होम का निरीक्षण करिए.. तब पता चलेगा सरकारी डॉ कितनी इमानदारी से प्रायवेट अस्पतालों में ड्यूटी कर रहें है, सरकारी अस्पताल के डाक्टर हॉस्पिटल में सुबह सार्थक ऐप पर अंगूठा लगा कर लॉगिन करते है और सीधे नर्सिंग होम पहुंच जाते और वंहा मरीज़ देखते है एक डाक्टर के पास 100, से 200 नंबर लगते है, प्रायवेट नर्सिंग होम से मरीज़ देख कर फिर एक बार शाम को इमर्जेंसी आ गई है मरीजों से बोल कर कुछ देर के लिए निकलते हैं तथा अस्पताल पहुंच कर लॉगआउट कर लेते है, फिर वंहा से फिर सीधे अपने उसी ठीहे में पहुंच जाते है जंहा 200 मरीजों का टार्गेट पूरा करना रहता है, इस लिए असली निरीक्षण तो प्रायवेट अस्पताल का माना जायेगा जंहा, पर जिला अस्पताल, संजय गांधी अस्पताल, और सुपर स्पेशिलिटी के डॉक्टर आप को अपनी असली ड्यूटी करते मिल जाएंगे, रीवा में कई प्रायवेट हॉस्पिटल नियम कानून को धता बता कर संचालित हो रहे हैं, जंहा न तो पार्किंग की व्यवस्था है न ही कोई नियम कानून चलता है, न ही अन्य मूलभूत सुविधाएं है, इन्हें लाइसेंस कहाँ से मिल गया यह बात भी सवालों के घेरे में है...?
आदरणीय कलेक्टर साहब इसके पूर्व भी रीवा सहित प्रदेश व देश के विभिन्न हिस्सों में कई गंभीर और अमानवीय घटनाएं घटित हो चुकी हैं.. हमारे यहां जब घटना घटित होती है तब उस समय शासन और प्रशासन पूरी तरह सक्रिय दिखाई देता है.. ऐसा लगता है अब सब सही हो जायेगा उसके बाद पुनः धीरे-धीरे स्थितियां सामान्य होती हैं, और फिर जो जिस रास्ते पर चलने वाला है वह पुनः वापस उसी रास्ते पर लौट आता है, सारी की सारी व्यवस्था फिर से उसी अव्यवस्था में बदल जाती है, यही कारण है कि सार्थक समाधान नहीं मिल पाता है, फिर हम और हमारा सिस्टम दूसरी घटना का इंतजार करते हैं, तब तक कोई ध्यान नहीं देता जब तक दूसरी तीसरी चौथी घटना घटती नहीं होती है.. इसके बाद फिर कुछ दिनों तक माहौल गर्म होता है.. धरना प्रदर्शन आंदोलन होगा तब लगता है कि अब सब व्यवस्था सुधर जाएगी पर ऐसा होता नहीं है... आखिर ऐसा कब तक चलेगा यह अपने आप मे यक्ष प्रश्न है...आप से रीवा को बहुत उम्मीद है...अगर यह व्यवस्था पटरी पर आ गई तो आप का नाम रीवा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जायेगा...!
रीवा में कार्य तो अद्भुत हुए लेकिन गुणवत्ता का अभाव
रीवा जिले में अद्भुत कार्य हुए है इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन प्रॉपर मॉनीटरिंग नहीं की गई न ही गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया जिसकी बजह से इतना काम होने के बाद भी लोगों की परेशानियां कम नहीं हुई, शहर की सड़कें एक साल में दो बार बनतीं है पर गड्ढे कम नहीं हो रहे, निर्माण में गुणवत्ता की कमी देखी जा रही है इसकी बजह आख़िर क्या है, जिम्मेदारों और ठेकेदारों पर कसावट नहीं लाई गई, इसलिए अब जरूरत है मुनाफाखोरों पर लगाम लगाने की डाक्टरों की मनमानी और प्रायवेट प्रैक्टिस पर लगाम लगाने की, क्योंकि अधिकतर डॉ प्रायवेट नर्सिंग होम चलाते है और हॉस्पिटल में टाइम टू टाइम नहीं रहते, दूसरी बात हॉस्पिटल के कुछ कर्मचारी, वार्डब्वाय, नर्से, सफाई कर्मचारी, एम्बुलेंस वाले, सिक्योरिटी गार्ड, हॉस्पिटल में भर्ती मरीजों को गुमराह करते हैं, प्रायवेट हॉस्पिटल में मरीज़ को लेकर जाने, कि बात करते देखे जाते है, कहते है यहां पड़े रहोगे अच्छा इलाज नहीं होता है, ऐसे में मरीज़ और उसके परिजन भयभीत होकर प्रायवेट नर्सिंग होम में जाने को मजबूर हो जाते है, इसके बदले इन्हें मोटा कमीशन दिया जाता है, यही नहीं अधिकतर डॉ गंभीर मरीजों को इतना रगड़ कराते है...और बार बार पेशी करते है.. तथा OPD में अच्छे से मरीज़ नहीं देखते ताकि मरीज़ परेशान होकर उनके निजी अस्पतालों में आए.. फिर वंहा फालतू की जांच और मनमानी लुटाई कर सके, यहां तक कि डॉ. रिपोर्ट देखने तक कि भी फीस वसूलते है, कई बार तो संजय गांधी और सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल से कराई गई जांच को कहते है कि यह विश्वसनीय नहीं है प्रायवेट में फिर से कराओ यहां तक कि सरकारी हॉस्पिटल के अंदर भी प्रायवेट जांच करने वाले लैब से लोगों को बुला लिया जाता है, कई बार तो मेरे सामने ऐसी घटनाये घटित हुई है जिसके हमारे पास प्रमाण भी है रिकार्डिंग भी है डाक्टर्स द्वारा यह कहते हुए कि यहां की जांच सही नहीं है, और जो जांच सरकारी हॉस्पिटल में उपलब्ध है उसे भी कह देते है यहां नहीं होती बाहर से कराओ खुद बाहर के लैब वालों को वहीं बुलाते है और भर्ती मरीज़ के परिजनों से पैसे भरने का दबाब बनाते है, इसमें भी कमीशन रहता है, इस दिशा में शासन और प्रशासन स्तर पर विशेष कसावट की जरूरत है ....शासन प्रशासन कितना भी अच्छा प्रयास करे कुछ खास असर नहीं होगा, आप कितने भी डीन और अधीक्षक हटा लीजिए सुधार होने वाला नहीं है.... जब तक मूल समस्या और जड़ पर प्रहार नहीं होगा..जब तक लोग अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करेंगे...
