जच्चा-बच्चा मौत मामले में चौथे दिन भी सड़क पर न्याय की पुकार, बालेंद्र शुक्ला ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

जच्चा-बच्चा मौत मामले में चौथे दिन भी सड़क पर न्याय की पुकार, बालेंद्र शुक्ला ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

रीवा - गांधी मेमोरियल अस्पताल में प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की मौत का मामला अब अस्पताल की चारदीवारी से निकलकर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी चिकित्सा संस्थानों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बन गया है। घटना के बाद अस्पताल प्रशासन की ओर से कार्रवाई की गई है। दो डॉक्टर और दो नर्सिंग स्टाफ को निलंबित किया गया है, अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को पद से हटाया गया है तथा मामले की उच्चस्तरीय और कलेक्टर स्तर पर जांच भी जारी है। इसके बावजूद पीड़ित परिवार का धरना चौथे दिन भी सिरमौर चौराहे पर जारी रहा।

सवाल यह है कि जब निलंबन से लेकर जांच तक की कार्रवाई हो चुकी है, तो फिर पीड़ित परिवार को सड़क पर बैठकर न्याय की मांग क्यों करनी पड़ रही है? क्या प्रशासनिक कार्रवाई और पीड़ित परिवार के भरोसे के बीच अभी भी कोई ऐसी दूरी है, जिसे पाटना बाकी है?

कार्रवाई हुई, लेकिन परिवार को चाहिए अंतिम जवाब

पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें केवल अधिकारियों के स्तर पर कार्रवाई की घोषणा नहीं चाहिए, बल्कि घटना की पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। किस स्तर पर चूक हुई, किसकी जिम्मेदारी थी और यदि जांच में गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ आगे क्या वैधानिक कार्रवाई होगी—परिवार इन्हीं सवालों के जवाब चाहता है।

निलंबन निश्चित रूप से प्रशासनिक कार्रवाई है, लेकिन यह अपने आप में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। इसलिए अब जांच रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो गई है। यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही, उपचार में गंभीर चूक या किसी अधिकारी-कर्मचारी की वैधानिक जिम्मेदारी सामने आती है तो आगे की कार्रवाई क्या होगी, यह प्रशासन को स्पष्ट करना होगा।

धरना स्थल पर पहुंच रहे जनप्रतिनिधि

चौथे दिन भी जारी धरने को कई जनप्रतिनिधियों ने समर्थन दिया। सेमरिया विधायक अभय मिश्रा, जिला पंचायत सदस्य लालमणि त्रिपाठी और जनपद सदस्य कुंजबिहारी तिवारी धरना स्थल पर पहुंचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। इससे पहले डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल, पूर्व विधायक पंचूलाल प्रजापति और मंनगवा विधायक नरेंद्र प्रजापति भी परिवार से मिल चुके हैं।

लगातार जनप्रतिनिधियों के पहुंचने से मामला राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। परिवार का आंदोलन अब केवल एक अस्पताल की घटना तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही की मांग का रूप लेता जा रहा है।

बालेंद्र शुक्ला ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

भाजपा के वरिष्ठ नेता बालेंद्र शुक्ला ने धरने का समर्थन करते हुए रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि एक पिता अपनी पत्नी और नवजात की मौत का जवाब मांगते हुए चार दिन से सड़क पर बैठा है। शासन-प्रशासन के प्रतिनिधि परिवार से मिल चुके हैं, जांच के आदेश हो चुके हैं और निलंबन की कार्रवाई भी हो चुकी है, फिर भी परिवार धरना समाप्त करने को तैयार नहीं है। ऐसे में व्यवस्था को स्वयं से सवाल करना चाहिए कि आखिर पीड़ित को ऐसा भरोसा क्यों नहीं मिल पा रहा कि उसे न्याय मिलेगा।

शुक्ला ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पताल की इमारत, डॉक्टरों और मशीनों का नाम नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण आधार मरीज और उसके परिवार का भरोसा है। यदि यही भरोसा कमजोर होता है तो पूरी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

सरकारी अस्पताल और निजी चिकित्सा व्यवस्था के बीच संबंधों की भी हो जांच

बालेंद्र शुक्ला ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के साथ-साथ निजी प्रैक्टिस और निजी नर्सिंग होम की बढ़ती भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि रीवा में लगातार निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों का विस्तार हो रहा है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि सरकारी अस्पताल में पदस्थ चिकित्सकों की ड्यूटी और निजी चिकित्सा गतिविधियों के बीच कोई हितों का टकराव तो नहीं है।

हालांकि किसी चिकित्सक या निजी संस्थान के संबंध में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन यदि ऐसी शिकायतें सामने आती हैं तो उनकी अभिलेख-आधारित जांच आवश्यक है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कौन चिकित्सक किस समय सरकारी अस्पताल में ड्यूटी पर था और उसी दौरान निजी संस्थान में उसकी कोई भूमिका थी या नहीं।

पीजी डॉक्टरों की भूमिका पर भी उठे सवाल

मामले के बीच पीजी अध्ययनरत चिकित्सकों से मरीजों के उपचार और ऑपरेशन से जुड़ी जिम्मेदारियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यहां मुद्दा पीजी छात्रों के प्रशिक्षण का नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के दौरान उनकी जिम्मेदारी और विशेषज्ञ चिकित्सक की प्रत्यक्ष निगरानी की सीमा का है।

जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संबंधित मरीज के उपचार के समय कौन-कौन से डॉक्टर ड्यूटी पर थे। क्या वरिष्ठ विशेषज्ञ मौके पर उपलब्ध थे? ऑपरेशन थिएटर की लॉगबुक क्या कहती है? एनेस्थीसिया रिकॉर्ड में क्या दर्ज है? प्री-ऑपरेटिव और पोस्ट-ऑपरेटिव मॉनिटरिंग किसने की? नर्सिंग स्टाफ की ड्यूटी किसके अधीन थी? इन सवालों का जवाब मेडिकल रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों से ही मिल सकता है।

जांच सिर्फ निलंबन तक सीमित न रहे

अब सबसे बड़ी उम्मीद जांच समिति की रिपोर्ट से है। जांच में केवल यह दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा कि किसे निलंबित किया गया। पूरे घटनाक्रम की टाइमलाइन सामने आनी चाहिए—मरीज कब अस्पताल पहुंची, उसकी चिकित्सकीय स्थिति क्या थी, उपचार का निर्णय किस स्तर पर हुआ, कौन डॉक्टर मौजूद था, कौन-सा उपचार दिया गया और किन परिस्थितियों में प्रसूता तथा नवजात की मौत हुई।

मेडिकल रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, ऑपरेशन थिएटर रिकॉर्ड, एनेस्थीसिया दस्तावेज, नर्सिंग चार्ट और विशेषज्ञों की राय को जांच का आधार बनाया जाना चाहिए। यदि रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाक्रम में अंतर सामने आता है तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

चौथे दिन का धरना प्रशासन के लिए बड़ा संदेश

चौथे दिन भी सड़क पर बैठा परिवार प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल खड़ा कर रहा है—कार्रवाई की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन न्याय का भरोसा कब मिलेगा?

बालेंद्र शुक्ला ने चेतावनी दी है कि यदि पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला तो व्यापक जनसमर्थन के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा। ऐसे में प्रशासन के सामने अब चुनौती केवल धरना समाप्त कराने की नहीं, बल्कि ऐसा निष्पक्ष और विश्वसनीय समाधान देने की है जिससे परिवार को सड़क पर बैठकर न्याय मांगने की आवश्यकता ही न रहे।

क्योंकि अस्पताल में होने वाली किसी भी मौत के पीछे केवल एक मेडिकल फाइल नहीं होती। उसके पीछे परिवार की उम्मीद, बच्चों का भविष्य और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर समाज का विश्वास जुड़ा होता है। कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के मामले में अब रीवा की नजर जांच रिपोर्ट पर है।

निलंबन हो चुका है—अब जांच का निष्कर्ष क्या होगा?
जांच चल रही है—जवाबदेही की अंतिम सीमा कौन तय करेगा?
और यदि गंभीर लापरवाही सामने आती है—तो आगे की वैधानिक कार्रवाई कब होगी?


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