शहडोल में पंचायत के विकास कार्य पर उठे सवाल, रिकॉर्ड और मौके की हकीकत के मिलान से सामने आ सकता है पूरा सच

शहडोल में पंचायत के विकास कार्य पर उठे सवाल, रिकॉर्ड और मौके की हकीकत के मिलान से सामने आ सकता है पूरा सच

शहडोल। पंचायत क्षेत्र में तालाब निर्माण से जुड़े एक मामले ने सरकारी विकास कार्यों की निगरानी और प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिकॉर्ड में तालाब से संबंधित कार्य दर्ज होने के बावजूद मौके की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सरकारी दस्तावेजों में तालाब मौजूद है तो जमीन पर उसकी मौजूदगी कितनी है?

मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अब पंचायत के पुराने रिकॉर्ड के साथ मौके की वास्तविक स्थिति का भौतिक सत्यापन जरूरी माना जा रहा है। जांच में यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि तालाब निर्माण या विकास कार्य के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी राशि जारी हुई और वास्तव में मौके पर कितना काम कराया गया।

इसके साथ ही तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र, भुगतान संबंधी दस्तावेज और पंचायत के प्रस्तावों की भी जांच किए जाने की जरूरत है। यदि दस्तावेजों में कार्य पूर्ण बताया गया है तो मौके पर उसकी स्थिति भी उसी अनुरूप दिखाई देनी चाहिए। रिकॉर्ड और जमीन की स्थिति में अंतर मिलने पर जिम्मेदारी तय करने का सवाल भी उठेगा।

पुराने मामले का हवाला देकर फिर दब जाएगी फाइल?

स्थानीय स्तर पर अब यह सवाल भी उठ रहा है कि मामले को पुराने प्रकरण का हवाला देकर फिर फाइलों में दबा दिया जाएगा या दस्तावेजों की नए सिरे से जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी। यदि सरकारी राशि खर्च हुई है तो उसका परिणाम जमीन पर दिखाई देना भी जरूरी है।

अब निगाहें संबंधित विभाग की जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं। तालाब सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सरकारी धन और पंचायत व्यवस्था की जवाबदेही का मामला है। दस्तावेज और मौके की हकीकत आमने-सामने आने के बाद ही साफ होगा कि काम वास्तव में हुआ था या सिर्फ कागजों में प्रक्रिया पूरी मानी गई।

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