केशवाही में इलाज के नाम पर बड़ा सवाल, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठी उंगली

केशवाही में इलाज के नाम पर बड़ा सवाल, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठी उंगली

शहडोल/केशवाही - ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के सरकारी दावों के बीच केशवाही क्षेत्र से सामने आया मामला स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि क्षेत्र में बिना वैध चिकित्सकीय डिग्री के इलाज करने वाले लोगों के क्लिनिक संचालित हो रहे हैं और ऐसे ही एक निजी क्लिनिक पर सुबह से मरीजों की भीड़ देखी जा रही है। स्थानीय स्तर पर सचिन कुशवाहा नामक व्यक्ति के बारे में आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसके पास आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता नहीं होने के बावजूद वह मरीजों का उपचार कर रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। यही कारण है कि मामले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा दस्तावेजों और क्लिनिक की वैधानिक स्थिति की जांच किया जाना जरूरी है।

बिना योग्यता इलाज कितना सुरक्षित?

ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोग मजबूरी, जानकारी के अभाव या तत्काल उपचार की जरूरत के कारण ऐसे व्यक्तियों से इलाज करा लेते हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब बिना उचित चिकित्सकीय योग्यता के दवाओं का इस्तेमाल किया जाए। स्थानीय चर्चाओं में आरोप है कि कुछ कथित झोलाछाप मरीजों को तेज असर वाली दवाएं, एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड तक देते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का विषय नहीं, बल्कि सीधे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। किसी भी दवा का गलत इस्तेमाल मरीज के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

मरीजों की भीड़ ने बढ़ाई चिंता

स्थानीय लोगों के अनुसार संबंधित क्लिनिक पर बड़ी संख्या में मरीज पहुंच रहे हैं। यह स्थिति अपने आप में यह सवाल खड़ा करती है कि यदि संबंधित व्यक्ति के पास इलाज करने की वैध पात्रता नहीं है तो स्वास्थ्य विभाग ने अब तक इसकी जांच क्यों नहीं की? क्या क्षेत्र में संचालित निजी क्लिनिकों का नियमित सत्यापन होता है? क्या वहां कार्यरत व्यक्तियों की शैक्षणिक और चिकित्सकीय योग्यता की जांच की जाती है? क्या दवाओं के इस्तेमाल और बिक्री की निगरानी की जाती है? इन सवालों के जवाब स्वास्थ्य विभाग को देने चाहिए।

‘मंथली’ के आरोपों की भी हो जांच

मामले को और गंभीर बनाने वाले आरोप यह हैं कि कुछ स्थानीय चर्चाओं में कथित अवैध प्रैक्टिस को संरक्षण मिलने और नियमित रूप से लेन-देन होने की बातें कही जा रही हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इनकी सत्यता सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि जांच में किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। जांच केवल क्लिनिक तक सीमित न रहकर पूरे नेटवर्क और संरक्षण देने वालों तक पहुंचनी चाहिए।

अब कार्रवाई का इंतजार

ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के बीच यदि अपात्र व्यक्ति चिकित्सा सेवा देने लगें तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता होगी। प्रशासन और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को केशवाही क्षेत्र में संचालित ऐसे सभी क्लिनिकों का सत्यापन कराना चाहिए। साथ ही संबंधित व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता, पंजीयन, क्लिनिक संचालन की अनुमति, दवाओं के उपयोग और मरीजों को दी जा रही उपचार पद्धति की जांच की जानी चाहिए। मामला केवल एक व्यक्ति के क्लिनिक का नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी की विश्वसनीयता का है। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग शिकायतों और आरोपों को गंभीरता से लेकर मौके पर जांच करता है या मामला कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है। मरीजों की जान से जुड़े इस मामले में सबसे जरूरी है—आरोपों की निष्पक्ष जांच, तथ्य सामने लाना और दोषी पाए जाने पर बिना किसी दबाव के कार्रवाई।


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