बारिश ने खोली विकास की पोल, रीवा-मऊगंज में नालियां और जलनिकासी व्यवस्था पर उठे सवाल

बारिश ने खोली विकास की पोल, रीवा-मऊगंज में नालियां और जलनिकासी व्यवस्था पर उठे सवाल

रीवा/मऊगंज - अगस्त 2026 में हुई तेज बारिश ने रीवा और मऊगंज क्षेत्र में विकास की उस तस्वीर को सामने ला दिया है, जिस पर वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते रहे हैं। लगातार बारिश के बाद शहरों से लेकर गांवों तक जलभराव और बाढ़ की स्थिति ने सड़क, नाली और जलनिकासी व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बढ़ती आबादी के साथ शहरों और गांवों में सड़क तथा नाली व्यवस्था को वैज्ञानिक तरीके से विकसित करना जरूरी है। बारिश से पहले जून-जुलाई में नालियों की सफाई, मरम्मत और जलनिकासी के इंतजाम पूरे हो जाने चाहिए, लेकिन आरोप है कि नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत और ग्राम पंचायत स्तर पर होने वाले कई काम कागजों तक सीमित रह जाते हैं। नतीजा यह है कि बारिश आते ही वही इलाके जलभराव की समस्या से जूझने लगते हैं।

करोड़ों खर्च के बाद भी पानी निकासी का संकट

स्थानीय लोगों का कहना है कि रीवा और मऊगंज क्षेत्र में वर्षों से नाली निर्माण और सड़क विकास पर बड़ी राशि खर्च की गई, लेकिन कई स्थानों पर नालियां पर्याप्त चौड़ी और व्यवस्थित नहीं हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्राकृतिक नालों के अवरुद्ध होने तथा जलनिकासी के रास्ते संकरे होने से बारिश का पानी तेजी से बाहर नहीं निकल पाता। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। कई जगह घरों में पानी घुसने, सड़कें जलमग्न होने और आवागमन बाधित होने की स्थिति बनती है। किसानों को भी खेतों में पानी भरने और फसल खराब होने का नुकसान उठाना पड़ता है।

नदी-नालों के किनारे निर्माण भी बड़ा सवाल

बारिश ने नदी-नालों और जलनिकासी मार्गों के आसपास हुए कथित अतिक्रमण को भी चर्चा में ला दिया है। सवाल उठ रहा है कि प्राकृतिक जलप्रवाह के रास्ते यदि संकरे किए गए हैं तो उनकी अनुमति किस स्तर पर मिली और संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने नालों और जलस्रोतों के आसपास निर्माण या प्लॉटिंग की है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे मामलों में प्रशासन को राजस्व रिकॉर्ड, निर्माण अनुमति और अतिक्रमण की स्थिति की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।

हर साल राहत, स्थायी समाधान कब?

बाढ़ या जलभराव के बाद राहत और सहायता के लिए सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता भी दी जाती है, लेकिन सवाल यह है कि यदि हर वर्ष इसी तरह की समस्या दोहराई जा रही है तो स्थायी जलनिकासी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही? जरूरत इस बात की है कि केवल नाली निर्माण या मरम्मत पर खर्च करने के बजाय पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक ड्रेनेज प्लान तैयार किया जाए। इसमें प्राकृतिक नालों, नदी-नालों, तालाबों और जलप्रवाह के पुराने रास्तों को चिन्हित कर उन्हें सुरक्षित रखा जाए।

जांच हो तो सामने आ सकती है तस्वीर

अब मांग उठ रही है कि पिछले वर्षों में नाली और जलनिकासी व्यवस्था पर खर्च हुई राशि, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, स्वीकृत लेआउट, तकनीकी मूल्यांकन और पूर्णता प्रमाण-पत्रों की जांच की जाए। साथ ही यह भी देखा जाए कि बारिश से पहले सफाई और मरम्मत के लिए जारी निर्देशों का कितना पालन हुआ। बाढ़ केवल प्रकृति की मार नहीं, कई बार हमारी अव्यवस्थित योजना का परिणाम भी बन जाती है। यदि प्राकृतिक जलप्रवाह के रास्ते बंद होंगे, नालियां छोटी होंगी और निर्माण बिना दीर्घकालीन योजना के होगा, तो तेज बारिश के सामने कोई भी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। अब रीवा-मऊगंज की जनता का सवाल सीधा है—हर साल बारिश के बाद राहत बांटने की व्यवस्था मजबूत करने के बजाय बारिश से पहले जलनिकासी व्यवस्था मजबूत करने पर गंभीरता कब दिखाई जाएगी?

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