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| आस्था के पथ पर सामूहिक चेतना का महाकुंभ- कांवड़ यात्रा को लेकर ब्राह्मण महासभा का संकल्प |
रीवा - जब श्रद्धा केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जनमानस की धड़कनों में उतरकर सामूहिक संकल्प का रूप लेती है, जब धर्म केवल पूजा- पद्धति न रहकर सेवा, संस्कार, संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व की जीवंत अनुभूति बन जाता है, तब कोई धार्मिक आयोजन महज एक यात्रा नहीं रहता- वह समाज की सुप्त चेतना को जागृत करने वाला आध्यात्मिक अभियान बन जाता है। रीवा में आगामी 16 अगस्त 2026, रविवार को आयोजित होने वाली पावन कांवड़ यात्रा इसी विराट भावभूमि का साक्षात् स्वरूप बनने जा रही है। स्वर्गीय विद्यादेवी सेवा संकल्प समिति के तत्वावधान में पूर्व वर्षों की पावन परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आयोजित इस यात्रा में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा, जिला रीवा ने सक्रिय सहभागिता का संकल्प लिया है। यह यात्रा केवल शिवभक्ति का उत्सव नहीं, बल्कि स्मृति को संकल्प में, श्रद्धा को सेवा में और परंपरा को सामाजिक चेतना में रूपांतरित करने का प्रयास है। इस संपूर्ण आध्यात्मिक आयोजन के केंद्र में जिस पुण्य स्मृति का आलोक सबसे अधिक दिखाई देता है, वह है स्वर्गीय विद्यादेवी का। ‘विद्या’ केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं, वह विवेक का प्रकाश है, अंतःकरण की निर्मलता है और अज्ञान के अंधकार को चीरने वाली चेतना है। इसलिए विद्यादेवी की स्मृति में आयोजित यह कांवड़ यात्रा उनके नाम का मात्र स्मरण नहीं, बल्कि उन मूल्यों को कर्मभूमि पर उतारने का प्रयास है, जिनमें सेवा, करुणा, संस्कार, अध्यात्म और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निहित है। किसी पुण्यात्मा की स्मृति पत्थरों पर लिखे शब्दों से अमर नहीं होती। वह तब जीवित रहती है, जब आने वाली पीढ़ियां उस जीवन से प्रेरणा लेकर सत्कर्म की नई इबारत लिखती हैं। विद्यादेवी की स्मृति इसी अर्थ में इस यात्रा की आत्मा बनकर उपस्थित है।
कांवड़ को यदि केवल गंगाजल वहन करने की परंपरा समझा जाए, तो उसकी आध्यात्मिक गहराई कहीं पीछे छूट जाती है। कांवड़ वास्तव में आत्मशुद्धि की साधना है। हर कदम संयम का मंत्र है। हर बूंद जल श्रद्धा का स्पंदन है। हर पड़ाव आत्मावलोकन है। और शिव की ओर बढ़ता प्रत्येक चरण मनुष्य के भीतर छिपे शिवत्व को जागृत करने का आह्वान है। कांवड़ उठाने वाला श्रद्धालु केवल जल नहीं उठाता- वह अपने भीतर के अहंकार, विकार, असंयम और नकारात्मकता को त्यागने का मौन संकल्प भी अपने कंधों पर धारण करता है। और जब यही व्यक्तिगत साधना सामूहिक हो जाती है, तब यात्रा आस्था से उठकर सामाजिक चेतना का स्वर बन जाती है। कांवड़ यात्रा की तैयारियों को लेकर गायत्री मंदिर, रीवा में आयोजित बैठक इसी सामूहिक चेतना का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। बैठक में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित विजय मोहन तिवारी के नेतृत्व में यात्रा की व्यवस्थाओं, सहभागिता और व्यापक जनसंपर्क को लेकर विचार- विमर्श किया गया। इस अवसर पर सुनीति व्यास, सुमन शुक्ला, डॉ. सविता मिश्रा, निर्मल उपाध्याय, पी एल अवस्थी, डॉ मुकुंद राय, डॉ संजय मिश्रा, राकेश शुक्ला, महेंद्र मिश्रा, उमेश तिवारी, बसंत लाल द्विवेदी, जमुना प्रसाद चतुर्वेदी, दिनेश तिवारी, सनत तिवारी, अनिल तिवारी, भास्कर तिवारी, भूपेंद्र तिवारी, विष्णु शर्मा, प्रभाकर मिश्रा, मनीष गौतम, राकेश शर्मा, अशोक मिश्रा, राकेश मोहन शुक्ला, पुरुषोत्तम सोनी, रामवक्ष तिवारी सहित अनेक पदाधिकारी एवं समाजजन उपस्थित रहे। बैठक में यह संकल्प व्यक्त किया गया कि अधिकाधिक श्रद्धालुओं को यात्रा से जोड़ा जाएगा और घर- घर तक इस पावन आयोजन का संदेश पहुंचाया जाएगा। उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं को एक साझा आध्यात्मिक भाव, सेवा- संकल्प और सामाजिक एकात्मता के सूत्र में जोड़ना है।
कांवड़ यात्रा का शुभारंभ 16 अगस्त 2026, रविवार को सुबह 8 बजे होगा। यात्रा का प्रारंभ विश्वकर्मा घाट, बड़ा पुल के पास से होगा। यहां से शिवभक्त कांवड़ लेकर निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ेंगे। यात्रा का निर्धारित मार्ग- विश्वकर्मा घाट, बड़ा पुल, जय स्तंभ, बैजू धर्मशाला, स्टैचू चौराहा, फोर्ड रोड, एस.के. स्कूल के बगल से होते हुए पचमठा धाम पहुंचकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाएगा और इसके पश्चात भंडारे के साथ कांवड़ यात्रा का विधिवत समापन होगा। यह मार्ग केवल शहर की सड़कों से गुजरने वाला मार्ग नहीं होगा, बल्कि श्रद्धा के उन पड़ावों से गुजरता हुआ आध्यात्मिक पथ होगा, जहां प्रत्येक कदम शिव के प्रति समर्पण और प्रत्येक पड़ाव सामूहिक चेतना का प्रतीक बनेगा। आज के समय में धार्मिक आयोजनों की सार्थकता केवल उनकी भव्यता से नहीं, बल्कि उनके भीतर प्रवाहित सामाजिक संवेदना से निर्धारित होती है। यदि धर्म मनुष्य को मनुष्य के निकट लाए, यदि आस्था अहंकार को विनम्रता में परिवर्तित करे, यदि पूजा के साथ सेवा का भाव जागृत हो, और यदि परंपरा आने वाली पीढ़ियों को संस्कार सौंपे तो वही धर्म समाज के लिए कल्याणकारी चेतना बन जाता है। स्वर्गीय विद्यादेवी की स्मृति में आयोजित यह यात्रा इसी दर्शन की संवाहक बनने जा रही है। श्रद्धा को सेवा से, स्मृति को संकल्प से, परंपरा को संस्कार से, और व्यक्ति को समाज से जोड़ने वाली यह यात्रा- रीवा की आध्यात्मिक चेतना में एक नया अध्याय लिखने का प्रयास है। 16 अगस्त को विश्वकर्मा घाट से उठने वाली कांवड़ जब जय स्तंभ, बैजू धर्मशाला, स्टैचू चौराहा और फोर्ड रोड से होते हुए पचमठा धाम पहुंचेगी, तब उसके साथ केवल कांवड़ नहीं चलेगी- चलेंगे विश्वास, संस्कार, स्मृतियां और सामूहिक संकल्प। स्वर्गीय विद्यादेवी की पुण्य स्मृति इस यात्रा को भावनात्मक आधार दे रही है। शिवभक्ति इसे आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान कर रही है। सेवा संकल्प समिति इसे उद्देश्य दे रही है। और समाज की सहभागिता इसे व्यापकता प्रदान कर रही है। इसलिए यह यात्रा केवल विश्वकर्मा घाट से पचमठा धाम तक की दूरी नहीं है। यह यात्रा है- अहं से आत्मा की ओर, व्यक्ति से समाज की ओर, स्मृति से संकल्प की ओर, और श्रद्धा से सेवा की ओर। क्योंकि कुछ यात्राएं केवल कदमों से पूरी नहीं होतीं- वे भावनाओं से चलती हैं और संस्कारों में अपना पड़ाव बनाती हैं। और कुछ पुण्य स्मृतियां कभी विदा नहीं होतीं- वे समाज के सत्कर्मों में पुनः जन्म लेती रहती हैं। स्वर्गीय विद्यादेवी की स्मृति में होने वाली यह कांवड़ यात्रा उसी अमर स्मृति का जीवंत स्पंदन है- जहां हर कदम में श्रद्धा, हर बूंद में भक्ति, हर सेवा में करुणा और हर संकल्प में सनातन चेतना का प्रकाश दिखाई देगा।
