मुख्यमंत्री जनविश्वास शिविर में अधिकारी-कर्मचारी ज्यादा, जनता कम; 123 आवेदन फिर भी सवाल—क्या व्यवस्था पर घट रहा भरोसा?

मुख्यमंत्री जनविश्वास शिविर में अधिकारी-कर्मचारी ज्यादा, जनता कम; 123 आवेदन फिर भी सवाल—क्या व्यवस्था पर घट रहा भरोसा?

रीवा। शासन की मंशा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जिला मुख्यालय या विभागीय कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। इसी उद्देश्य से मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के तहत गांव-गांव शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। लेकिन 7 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत गढ़, जनपद पंचायत गंगेव के सीएफटी भवन में आयोजित मुख्यमंत्री जनविश्वास शिविर में अपेक्षाकृत कम संख्या में आमजन की मौजूदगी ने अभियान की जमीनी पहुंच और जनविश्वास को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए।

शिविर में विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। विधायक मनगवां, जनपद अध्यक्ष गंगेव, एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, बीएमओ, बीईओ, थाना प्रभारी गढ़ सहित लगभग सभी संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। इसके बावजूद शिविर में ग्रामीणों की उपस्थिति उस स्तर की नहीं दिखाई दी, जिसकी उम्मीद इतने व्यापक प्रशासनिक आयोजन से की जाती है।

हालांकि शिविर में कुल 123 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें राजस्व विभाग से 42, पंचायत से 30, विद्युत विभाग से 25, खाद्य विभाग से 7, सामाजिक न्याय से 5, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी से 4, महिला एवं बाल विकास से 3, पीडब्ल्यूडी से 3, कृषि से 2, समग्र से 2, एमपीआरडीसी से 1 और मतदाता सूची में नाम सुधार से संबंधित 1 आवेदन शामिल रहा। इसके अलावा विभिन्न विभागों से जुड़े 18 अन्य आवेदन भी सामने आए।

आवेदनों की संख्या यह बताती है कि ग्रामीण क्षेत्र में समस्याएं मौजूद हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समस्याएं हैं तो शिविर में जनता की संख्या अपेक्षाकृत कम क्यों रही?

क्या जनता को शिविरों से समाधान की उम्मीद कम हो गई?

जनसुनवाई या जनविश्वास शिविर की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे। वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि कितने लोग अपनी समस्या लेकर पहुंचे और उनके आवेदन का कितनी तेजी से समाधान हुआ।

गढ़ के शिविर की तस्वीर ने इसी बिंदु पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने सवाल खड़ा किया है। क्या ग्रामीणों को पहले से जानकारी नहीं थी? क्या प्रचार-प्रसार पर्याप्त नहीं हुआ? या फिर लोगों को यह विश्वास नहीं है कि शिविर में आवेदन देने के बाद उनकी समस्या का समय-सीमा में समाधान हो जाएगा?

यह भी सवाल है कि क्या पुराने आवेदनों और शिकायतों के लंबित रहने के कारण ग्रामीणों में जनसुनवाई व्यवस्था को लेकर निराशा पैदा हुई है?

भाजपा पदाधिकारी की सात साल पुरानी समस्या ने बढ़ाए सवाल

शिविर में सामने आया एक मामला व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर और गंभीर सवाल खड़ा करता है। भाजपा मंडल लालगांव के उपाध्यक्ष मुनेन्द्र लाल सोनी, निवासी गढ़, द्वारा भूमि संबंधी समस्या के निराकरण के लिए लंबे समय से प्रयास किए जाने की बात सामने आई।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उनकी भूमि संबंधी समस्या पिछले लगभग सात वर्षों से राजस्व न्यायालय और संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद पूरी तरह हल नहीं हो सकी है। उनका कहना है कि राजस्व न्यायालय से आदेश होने के बाद भी कंप्यूटर रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार दर्ज नहीं किया गया।

यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि शिकायतकर्ता स्वयं सत्तारूढ़ दल से जुड़े पदाधिकारी बताए जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि राजनीतिक संगठन से जुड़े व्यक्ति को भी अपनी समस्या के समाधान के लिए वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, तो उस सामान्य ग्रामीण की स्थिति क्या होगी जो किसी संगठन या राजनीतिक दल से नहीं जुड़ा है?

123 आवेदन में सबसे ज्यादा राजस्व और पंचायत के मामले

शिविर में प्राप्त आवेदनों का आंकड़ा भी क्षेत्र की प्राथमिक समस्याओं की तस्वीर सामने रखता है। राजस्व से जुड़े 42 आवेदन सबसे अधिक रहे, जबकि पंचायत से संबंधित 30 और विद्युत विभाग से जुड़े 25 आवेदन आए।

इसका मतलब यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन, नामांतरण, सीमांकन, पंचायत संबंधी कार्य और बिजली जैसी बुनियादी समस्याएं अभी भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

यदि मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान का उद्देश्य ऐसी समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान करना है, तो अब असली परीक्षा इन 123 आवेदनों की है। कितने आवेदन मौके पर हल हुए, कितनों का निराकरण समय-सीमा में होगा और कितने मामले फिर अगले शिविर तक लंबित रहेंगे?

भीड़ नहीं, समाधान बने जनविश्वास का पैमाना

शिविर में कम भीड़ को सीधे तौर पर जनता के प्रशासन से विश्वास उठने का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। ग्रामीणों की कम उपस्थिति के पीछे कई कारण हो सकते हैं—जानकारी का अभाव, खेती-किसानी का समय, प्रचार की कमी या यह धारणा कि आवेदन देने के बाद तत्काल समाधान नहीं मिलेगा।

लेकिन इस स्थिति को प्रशासन के लिए एक संकेत जरूर माना जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान का नाम ही बताता है कि इसका मूल उद्देश्य जनता और प्रशासन के बीच विश्वास मजबूत करना है। इसलिए केवल शिविर लगाना पर्याप्त नहीं होगा। शिविर के बाद अधिकारियों को प्रत्येक आवेदन की स्थिति सार्वजनिक करनी होगी और यह बताना होगा कि कितने मामलों का समाधान हुआ।

अब प्रशासन के सामने असली चुनौती

गढ़ में आयोजित शिविर ने एक तरफ 123 समस्याओं को प्रशासन के सामने रखा, तो दूसरी तरफ जनभागीदारी को लेकर सवाल भी खड़े किए। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इन सवालों को आलोचना के रूप में लेने के बजाय सुधार के अवसर के रूप में देखे।

क्या गढ़ क्षेत्र में समस्याएं वास्तव में कम हैं, इसलिए जनता कम पहुंची? या फिर समस्याएं मौजूद होने के बावजूद लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है? इन दोनों सवालों का जवाब आंकड़ों और अगले चरण की कार्रवाई से ही मिलेगा।

अगर 123 आवेदनों में से अधिकांश का समयबद्ध समाधान होता है और इसकी जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचती है, तो अगली बार शिविर में जनता की भागीदारी बढ़ सकती है। लेकिन यदि आवेदन केवल दर्ज होकर फाइलों में दब गए, तो जनविश्वास अभियान का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।




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