पुलिस की सूझबूझ से टला मजहबी टकराव, अब लौर थाना प्रभारी की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

पुलिस की सूझबूझ से टला मजहबी टकराव, अब लौर थाना प्रभारी की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

मऊगंज/रीवा - लौर थाना क्षेत्र के ग्राम अल्हौआ में पेट्रोल डालकर गंभीर रूप से जलाए गए अजहरुद्दीन उर्फ राजू की चार दिन तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद मौत हो गई। युवक की मौत के बाद परिजनों और समाज में आक्रोश बढ़ गया। हालांकि संवेदनशील परिस्थितियों के बीच मऊगंज पुलिस की सक्रियता, संवाद और प्रशासनिक सूझबूझ से संभावित सांप्रदायिक तनाव को बढ़ने से रोकने में सफलता मिली। अब इस पूरे मामले में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई और लौर थाना प्रभारी रेनू सिंह की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। घटना के बाद पुलिस अधीक्षक मऊगंज, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और एसडीओपी सची पाठक सहित वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति पर नजर बनाए रखी। पुलिस महानिरीक्षक रीवा जोन के स्तर से भी घटनाक्रम की निगरानी और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। पुलिस की प्राथमिकता कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ पीड़ित परिवार और समाज के जिम्मेदार लोगों से लगातार संवाद बनाए रखना रही।

संवाद बना तनाव रोकने का सबसे बड़ा हथियार

अजहरुद्दीन की मौत की खबर के बाद अस्पताल से लेकर उसके गांव तक तनाव बढ़ने की आशंका थी। ऐसे समय में पुलिस ने केवल बल तैनात करने के बजाय पीड़ित परिवार, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों से संवाद स्थापित किया। अधिकारियों ने परिजनों को भरोसा दिलाने और स्थिति को शांत बनाए रखने का प्रयास किया। इसका असर भी दिखाई दिया। गंभीर आपराधिक घटना को सांप्रदायिक टकराव का रूप देने की संभावित कोशिशों के बीच समाज के जिम्मेदार लोगों ने संयम बरता और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। यही पुलिस प्रशासन की बड़ी उपलब्धि रही कि संवेदनशील माहौल में स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं गई। लेकिन अब पुलिस के सामने इससे भी बड़ी चुनौती है—क्या जिस सूझबूझ से संभावित सामाजिक टकराव को रोका गया, उसी निष्पक्षता से पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर लगे आरोपों की भी जांच होगी?

चार दिन तक जिंदगी से लड़ता रहा अजहरुद्दीन

ग्राम अल्हौआ में 25 अगस्त को हुई घटना में अजहरुद्दीन उर्फ राजू पेट्रोल से आग लगाए जाने के कारण गंभीर रूप से झुलस गया था। उसे उपचार के लिए रीवा के संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय के बर्न यूनिट में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों के प्रयास के बावजूद चार दिन बाद शुक्रवार को उसकी मौत हो गई। युवक की मौत की सूचना मिलते ही परिजनों का आक्रोश सामने आया। परिजन शव को तत्काल वार्ड से हटाने के लिए तैयार नहीं थे। उनका आरोप था कि घटना में सामने आए आरोपी के अलावा अन्य लोगों की भूमिका और संभावित साजिश की भी जांच की जानी चाहिए। समाजसेवियों और पुलिस अधिकारियों की समझाइश के बाद शव को मर्च्युरी में रखवाया गया। पुलिस आरोपी रामशिरोमणि जायसवाल को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। अब युवक की मौत के बाद प्रकरण की परिस्थितियों के अनुरूप धाराओं में बदलाव और आगे की वैधानिक कार्रवाई भी महत्वपूर्ण होगी।

लौर थाना प्रभारी पर क्यों भड़के परिजन?

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू लौर थाना पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई को लेकर सामने आ रहा है। मृतक के परिजनों ने थाना प्रभारी रेनू सिंह की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्हें तत्काल थाने से हटाने की मांग की है।परिजनों का आरोप है कि इतनी गंभीर घटना के बाद प्रारंभिक स्तर पर पुलिस ने अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई। उनका यह भी कहना है कि मौजूदा थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए उन्हें निष्पक्ष जांच और न्याय का भरोसा नहीं है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में पुलिस विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना और आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। परिजनों के साथ सामाजिक संगठनों ने पुलिस अधीक्षक मऊगंज और पुलिस महानिरीक्षक रीवा जोन से मांग की है कि शुरुआती पुलिस कार्रवाई की वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही, देरी या कर्तव्य के प्रति उदासीनता प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाए।

पुराने आरोपों का भी उठाया जा रहा हवाला

सामाजिक संगठनों की ओर से यह दावा भी किया जा रहा है कि थाना प्रभारी रेनू सिंह पूर्व में मऊगंज में पदस्थ रहने के दौरान सीएम हेल्पलाइन से जुड़े एक विवाद को लेकर भी चर्चा में रही थीं। संगठनों ने पुराने मामले का हवाला देते हुए वर्तमान पदस्थापना पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि पुराने आरोपों और कथित राजनीतिक संरक्षण जैसे दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही होनी चाहिए।

अब जांच के केंद्र में ये सवाल

अल्हौआ की घटना में अब कई सवालों के जवाब सामने आना जरूरी हैं। पुलिस को स्पष्ट करना होगा कि घटना की सूचना किस समय मिली? पुलिस मौके पर कब पहुंची? एफआईआर कब दर्ज हुई? प्रारंभ में किन धाराओं में मामला दर्ज किया गया? पीड़ित के बयान कब लिए गए? क्या घटनास्थल से साक्ष्य तत्काल जुटाए गए? और यदि किसी स्तर पर कार्रवाई में देरी हुई तो उसका कारण क्या था? इसके अलावा मृतक के परिजनों द्वारा लगाए जा रहे अन्य लोगों की भूमिका और संभावित साजिश के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

अपराधी का कोई धर्म नहीं, लेकिन न्याय सबके लिए समान होना चाहिए

अजहरुद्दीन की मौत अब केवल एक युवक को पेट्रोल डालकर जलाए जाने की घटना नहीं रह गई है। यह एक गंभीर आपराधिक मामला है, जिसमें प्रत्येक पहलू की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। आरोपी का धर्म नहीं, उसका अपराध महत्वपूर्ण होना चाहिए। साथ ही पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी आपराधिक घटना को लेकर अफवाह, उकसावे या सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की किसी भी कोशिश को सफल न होने दिया जाए। इस दिशा में मऊगंज पुलिस की सक्रियता और संवाद की रणनीति सराहनीय रही है। लेकिन कानून-व्यवस्था संभालने के साथ-साथ अब निष्पक्ष जांच और पुलिस जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल यही है—जब वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने सूझबूझ और संवाद से संभावित मजहबी टकराव को रोक लिया, तो क्या अब उसी दृढ़ता से लौर थाना पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर लगे आरोपों की भी जांच होगी?

यदि लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होगी?
यदि कोई साजिश थी तो उसके पीछे कौन था?
और सबसे महत्वपूर्ण—अजहरुद्दीन के परिवार को न्याय कब मिलेगा?

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