नईगढ़ी के कई निजी स्कूलों में नियमों की अनदेखी का आरोप, बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

नईगढ़ी के कई निजी स्कूलों में नियमों की अनदेखी का आरोप, बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल 

रीवा/नईगढ़ी - मध्य प्रदेश सरकार द्वारा निजी विद्यालयों के संचालन को लेकर जारी की गई नई और सख्त गाइडलाइन के बाद रीवा जिले के नईगढ़ी क्षेत्र में संचालित निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि क्षेत्र के बहुसंख्यक निजी स्कूल शासन द्वारा तय किए गए शैक्षणिक, बुनियादी और सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। फीस के नाम पर तो अभिभावकों की जेबें खाली कराई जा रही हैं, लेकिन सुविधाओं और गुणवत्ता के नाम पर विद्यार्थियों को केवल छलावा मिल रहा है।

कागजों में B.Ed. प्रशिक्षित, हकीकत में अप्रशिक्षित शिक्षक

अभिभावकों द्वारा लगाए गए आरोपों में सबसे चौंकाने वाला खुलासा शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर हुआ है। विभागीय दस्तावेजों और अभिलेखों में तो बड़े-बड़े B.Ed. और D.El.Ed. डिग्रीधारी शिक्षकों के नाम दर्ज हैं, लेकिन जब क्लासरूम की वास्तविक स्थिति देखी जाती है, तो वहां बिना किसी शैक्षणिक व व्यावसायिक प्रशिक्षण वाले लोग पढ़ाते मिलते हैं।

यदि शिक्षा विभाग निष्पक्षता से इसका भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करे, तो एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हो सकता है। यह न केवल शिक्षा विभाग के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि नौनिहालों के भविष्य के साथ सीधी धोखाधड़ी भी है।

मात्र ₹3,000 से ₹5,000 वेतन, कैसे टिकेंगे योग्य शिक्षक?

स्कूलों की इस मनमानी का मुख्य कारण कम लागत में अधिक मुनाफा कमाना है। आरोप है कि निजी स्कूल संचालक शिक्षकों को महज ₹3,000 से ₹5,000 प्रतिमाह का मामूली वेतन देकर काम करा रहे हैं। इतने कम वेतन में योग्य व प्रतिभावान शिक्षक इन स्कूलों में काम करने को तैयार नहीं होते। जो आते भी हैं, वे जल्द ही नौकरी छोड़ देते हैं। शिक्षकों के इस लगातार बदलाव और अयोग्य स्टाफ का सीधा और नकारात्मक असर बच्चों की पढ़ाई और उनके नतीजों पर पड़ रहा है।

लैब और लाइब्रेरी गायब, फिर भी वसूली जा रही भारी-भरकम फीस

अभिभावकों का कहना है कि दाखिले के समय बड़े-बड़े दावे करने वाले इन निजी स्कूलों में न तो विज्ञान प्रयोगशाला (Science Lab) है, न ही पुस्तकालय (Library) और न ही बच्चों के खेलने के लिए खेल का मैदान। इसके बावजूद हर साल मेंटेनेंस, स्पोर्ट्स और अन्य मदों के नाम पर हजारों रुपये की फीस वसूली जाती है। जमीनी स्तर पर सुविधाएं शून्य हैं और शिकायत करने पर प्रबंधन टालमटोल रवैया अपनाता है।

सड़क पर दौड़ती 'मौत की गाड़ियां': सुरक्षा ताक पर

बच्चों को घर से स्कूल लाने और ले जाने वाले वाहनों की स्थिति और भी खौफनाक है। परिवहन विभाग की स्पष्ट गाइडलाइन के बावजूद कई स्कूलों के पास मानक वाहन ही नहीं हैं। जो वाहन चल रहे हैं, वे भी सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक हैं:

  • अनिवार्य सुविधाओं का अभाव: ज्यादातर स्कूल बसों व वैन में अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher), इमरजेंसी एग्जिट और फर्स्ट एड बॉक्स जैसी प्राथमिक व्यवस्थाएं गायब हैं।

  • दिशानिर्देशों की अनदेखी: वाहनों पर न तो पीला रंग है, न ही कमर्शियल नंबर प्लेट। गाड़ियों पर "स्कूल बस", स्कूल का नाम या आपातकालीन संपर्क नंबर तक अंकित नहीं किए गए हैं।

अभिभावकों ने की निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

मामले की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्र के अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने जिला प्रशासन, जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) तथा क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) की संयुक्त टीम से गहन जांच की मांग की है।

अभिभावकों की प्रमुख मांगें:

  1. रिकॉर्ड में दर्ज B.Ed. शिक्षकों और वास्तव में पढ़ा रहे अध्यापकों का मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन हो।

  2. लैब, लाइब्रेरी और स्कूल भवनों के इंफ्रास्ट्रक्चर की जांच की जाए।

  3. स्कूल वाहनों की फिटनेस और सुरक्षा मानकों की तुरंत चेकिंग कर अवैध वाहनों को जब्त किया जाए।

  4. नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की मान्यता तुरंत रद्द कर कड़ी वैधानिक कार्रवाई हो।

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